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शक्तिपीठ कितने हैं? कथा, सूचियाँ और प्रमुख पीठ
शक्ति पीठ
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शक्तिपीठ वे देवी-तीर्थ हैं जहाँ परंपरा के अनुसार सती के शरीर के अंग गिरे थे। सबसे प्रचलित संख्या 51 है, लेकिन ग्रंथ 4 से लेकर 108 तक अलग-अलग गणनाएँ देते हैं — इसलिए “शक्तिपीठ कितने हैं” का कोई एक अंतिम उत्तर नहीं है। प्रमुख पीठों में असम का कामाख्या, कोलकाता का कालीघाट, हिमाचल की ज्वालामुखी और बलूचिस्तान की हिंगलाज गिने जाते हैं।
तंत्र सदा स्थान से जुड़ा रहा है। पीठों के साथ श्मशान, चौंसठ योगिनी मंदिर और कश्मीर जैसे विद्या-केंद्र मिलकर वह भूगोल बनाते हैं जिसमें यह परंपरा जीवित रही। इस पृष्ठ पर सती-कथा, गणनाओं का अंतर, प्रमुख पीठों की एक चुनी हुई तालिका, भैरव की परंपरा और दर्शन के समय ध्यान रखने योग्य बातें दी गई हैं।

शक्तिपीठ का अर्थ क्या है?
पीठ का अर्थ है आसन, चौकी या स्थान। शक्तिपीठ अर्थात् वह स्थान जहाँ देवी विशेष रूप से उपस्थित मानी जाती हैं। पौराणिक व्याख्या में यह सती के शरीर के अंगों से जुड़ा है, पर तांत्रिक साहित्य में पीठ का एक व्यापक अर्थ भी है — वह क्षेत्र जहाँ साधना विशेष फलदायी मानी जाती है, जैसे श्मशान, नदी-संगम या पर्वत-शिखर।
व्यवहार में हर पीठ की पहचान तीन बातों से होती है: देवी का स्थानीय नाम (जैसे कामाख्या, कालिका, ज्वालामुखी), वहाँ गिरा हुआ अंग, और साथ जुड़े भैरव का नाम। इन्हीं तीन सूचनाओं की सूची पीठ-ग्रंथों में मिलती है।
शक्तिपीठ की कथा: सती और दक्ष का यज्ञ
कथा दक्ष के यज्ञ से शुरू होती है। दक्ष एक विशाल यज्ञ करते हैं और अपने जामाता शिव को जान-बूझकर आमंत्रित नहीं करते। उनकी पुत्री सती फिर भी जाती हैं — महाभागवत पुराण के अनुसार शिव की आपत्ति को उन्होंने दस महाविद्या रूप दिखाकर हटाया था। यज्ञ में पिता के मुख से पति का अपमान सुनकर सती अपना शरीर त्याग देती हैं।
आगे की, पीठ-परंपरा वाली कथा कहती है कि शोक से उन्मत्त शिव सती का शव लेकर संसार में घूमते और प्रलयकारी नृत्य करते हैं। संतुलन बनाने के लिए विष्णु अपने सुदर्शन चक्र से शव के अंग अलग करते हैं — कुछ कथाओं में शिव के भ्रमण के दौरान ही अंग गिरते जाते हैं। जहाँ जो अंग गिरा, वहाँ एक पीठ बना।
इतिहास की दृष्टि से सती की आत्म-आहुति की कथा पुरानी है, पर अंग-विभाजन की कथा और पीठों की गिनती मध्यकालीन पौराणिक तथा तांत्रिक साहित्य में क्रमशः विकसित हुई। अनेक स्थान इससे बहुत पहले से स्थानीय देवियों के तीर्थ थे और बाद में इस अखिल भारतीय ढाँचे में जोड़े गए। इस विषय का शास्त्रीय अध्ययन डी. सी. सरकार की पुस्तक The Śākta Pīṭhas है।
शक्तिपीठ कितने हैं? 4, 18, 51, 52, 64 या 108
“51 शक्तिपीठ” सबसे सुनी जाने वाली संख्या है, पर ग्रंथ अलग-अलग गिनते हैं:
| संख्या | कहाँ से | टिप्पणी |
|---|---|---|
| 4 | आरंभिक तांत्रिक ग्रंथ (हिंदू और बौद्ध दोनों) | चार महापीठ — ओड्डियान, जालंधर, पूर्णगिरि और कामरूप |
| 18 | अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र, जो परंपरा में आदि शंकराचार्य से जोड़ा जाता है | दक्षिण भारत में विशेष प्रचलित; इसमें कामाख्या, कोल्हापुर की महालक्ष्मी, श्रीशैलम, कांची कामाक्षी और काशी विशालाक्षी आते हैं |
| 51 | पीठनिर्णय (तंत्रचूड़ामणि से संबद्ध) और लोकप्रिय बंगाली परंपरा | संस्कृत वर्णमाला के 51 अक्षरों से जोड़ा जाता है; सबसे अधिक उद्धृत संख्या |
| 52 | बंगाल में प्रचलित भिन्न सूचियाँ | 51 में एक स्थान और जोड़ देती हैं |
| 64 | कुछ तांत्रिक सूचियाँ | यही संख्या 64 योगिनियों और 64 तंत्रों में भी आती है |
| 108 | देवी भागवत पुराण और उससे जुड़ी सूचियाँ | देवी के 108 नाम और स्थान; यह व्यापक तीर्थ-सूची है, सब अंग-आधारित नहीं |
चूँकि सूचियाँ आपस में मेल नहीं खातीं, एक ही अंग का दावा कई मंदिर करते हैं, और कुछ बहुत प्रसिद्ध देवी-मंदिर एक सूची में हैं तो दूसरी में नहीं। इसलिए “51 शक्तिपीठ की पूरी और प्रामाणिक सूची” जैसे दावों को सावधानी से पढ़ना चाहिए — इस पृष्ठ की तालिका भी एक चयन है, अंतिम सूची नहीं।
प्रमुख शक्तिपीठों की तालिका (चयनित)
नीचे वे पीठ हैं जो लोकप्रिय और ग्रंथ-आधारित दोनों प्रकार की सूचियों में बार-बार आते हैं। अंग-संबंध सबसे अधिक उद्धृत परंपरा के अनुसार हैं; अन्य सूचियों में भिन्न हो सकते हैं।
| पीठ (देवी) | स्थान | राज्य / देश | अंग (परंपरा के अनुसार) |
|---|---|---|---|
| कामाख्या | नीलाचल पहाड़ी, गुवाहाटी | असम, भारत | योनि |
| कालीघाट (कालिका) | कोलकाता | पश्चिम बंगाल, भारत | दाहिने पैर की उँगलियाँ |
| किरीटेश्वरी | मुर्शिदाबाद जिला | पश्चिम बंगाल, भारत | किरीट (मुकुट) |
| बहुला | केतुग्राम, कटवा के निकट | पश्चिम बंगाल, भारत | बायाँ बाहु |
| ज्वालामुखी (सिद्धिदा / अंबिका) | कांगड़ा जिला | हिमाचल प्रदेश, भारत | जीभ |
| नैना देवी | बिलासपुर जिला | हिमाचल प्रदेश, भारत | नेत्र |
| त्रिपुरमालिनी (देवी तालाब) | जालंधर | पंजाब, भारत | बायाँ स्तन |
| विशालाक्षी | वाराणसी (मणिकर्णिका के निकट) | उत्तर प्रदेश, भारत | कर्णाभूषण |
| ललिता / अलोपी | प्रयागराज | उत्तर प्रदेश, भारत | अंगुलियाँ |
| कात्यायनी (उमा) | वृंदावन | उत्तर प्रदेश, भारत | केश |
| भद्रकाली (सावित्री) | कुरुक्षेत्र | हरियाणा, भारत | टखना |
| जया दुर्गा | बैद्यनाथ धाम, देवघर | झारखंड, भारत | हृदय (गुजरात का अंबाजी भी यही दावा करता है) |
| विरजा | जाजपुर | ओडिशा, भारत | नाभि |
| तारा तारिणी | गंजाम जिला | ओडिशा, भारत | स्तन |
| जयंती | नरतियांग, जयंतिया पहाड़ियाँ | मेघालय, भारत | बाईं जंघा |
| गुह्येश्वरी | पशुपतिनाथ के निकट, काठमांडू | नेपाल | घुटने (कुछ सूचियों में कटि) |
| हिंगलाज | लसबेला जिला, बलूचिस्तान | पाकिस्तान | ब्रह्मरंध्र (सिर का ऊपरी भाग) |
| जशोरेश्वरी | ईश्वरीपुर, सातखीरा | बांग्लादेश | हथेलियाँ और तलवे |
| चंद्रनाथ (भवानी) | सीताकुंड, चट्टगाँव | बांग्लादेश | दाहिना बाहु |
| मानसा | मानसरोवर झील | तिब्बत (चीन) | दाहिना हाथ |
कुछ सूचियाँ उज्जैन के हरसिद्धि मंदिर और कश्मीर के शारदा पीठ को भी गिनती हैं; क्षेत्रीय परंपराएँ यहाँ भिन्न हैं। अंग्रेजी पृष्ठ Sacred Geography पर यही तालिका और दक्षिण भारत के देवी-केंद्रों की सूची विस्तार से है।
कामाख्या: सबसे प्रमुख तांत्रिक पीठ
गुवाहाटी के ऊपर नीलाचल पहाड़ी पर स्थित कामाख्या को तांत्रिक परंपरा में सर्वोपरि शक्तिपीठ माना जाता है। यह प्राचीन कामरूप का केंद्र था, जिसकी प्रशंसा कालिका पुराण और योगिनी तंत्र जैसे ग्रंथों में मिलती है। गर्भगृह में कोई प्रतिमा नहीं है; पूजा एक प्राकृतिक शिला-दरार की होती है, जिसे स्रोत के जल से आर्द्र रखा जाता है और देवी की योनि — सृष्टि का उद्गम — माना जाता है। वर्तमान मंदिर सोलहवीं शताब्दी में कोच राजाओं के समय पुनर्निर्मित हुआ।
यहाँ हर वर्ष आषाढ़ में, वर्षा के आरंभ के साथ, अंबुबाची मेला होता है। लगभग तीन दिन मंदिर बंद रहता है, क्योंकि मान्यता है कि देवी रजस्वला हैं; फिर खुलने पर विशाल भीड़ जुटती है और लाल कपड़े के टुकड़े प्रसाद रूप में बाँटे जाते हैं। परिसर में दसों महाविद्याओं के मंदिर भी हैं, इसलिए यह महाविद्या उपासना का सबसे बड़ा केंद्र है। यहाँ आज भी पशुबलि होती है, जो परंपरागत होने के साथ विवादित भी है। ह्यू अर्बन की पुस्तक The Power of Tantra इस स्थल के इतिहास को तंत्र, राजसत्ता और देवी-उपासना के मेल के रूप में देखती है। विस्तृत गाइड: Kamakhya Temple।
तारापीठ, कालीघाट और बंगाल की शाक्त भूमि
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में रामपुरहाट के निकट तारापीठ देवी तारा का प्रमुख स्थान है। स्थानीय परंपरा इसे उस पीठ के रूप में गिनती है जहाँ सती का नेत्र गिरा। मंदिर की प्रतिमा में तारा शिव को स्तनपान कराती दिखाई जाती हैं। तारापीठ अपने महाश्मशान के लिए भी जाना जाता है, जहाँ रात्रि-साधना की लंबी परंपरा रही है, और सबसे प्रिय स्मृति यहाँ के संत बामाखेपा (1837–1911) की है।
कोलकाता का कालीघाट 51 पीठों में उस स्थान के रूप में गिना जाता है जहाँ सती के दाहिने पैर की उँगलियाँ गिरीं। उन्नीसवीं सदी में मंदिर के आसपास विकसित कालीघाट चित्र-शैली अब मान्यता प्राप्त कला-परंपरा है। पास ही दक्षिणेश्वर मंदिर, जो 1855 में रानी रासमणि ने बनवाया, पीठ नहीं है, पर श्री रामकृष्ण की साधना-भूमि होने के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारत के बाहर के शक्तिपीठ
पीठ-परंपरा राजनीतिक सीमाओं से पुरानी है, इसलिए कई पीठ आज भारत के बाहर हैं। पाकिस्तान के बलूचिस्तान में हिंगलाज — जिसकी यात्रा हिंगुला देवी के दर्शन के लिए आज भी होती है — नेपाल में पशुपतिनाथ के निकट गुह्येश्वरी, बांग्लादेश में जशोरेश्वरी और सीताकुंड का चंद्रनाथ, तथा तिब्बत में मानसरोवर के पास मानसा इनमें प्रमुख हैं। इन स्थानों तक यात्रा के नियम देश और समय के अनुसार बदलते हैं, इसलिए यात्रा से पहले वर्तमान आधिकारिक जानकारी देख लेना आवश्यक है।
शक्तिपीठ और भैरव
हिंदी में एक आम प्रश्न है — “शक्तिपीठ के भैरव कौन हैं?” परंपरा प्रत्येक पीठ के साथ शिव का एक रूप जोड़ती है, जो उस स्थान का रक्षक माना जाता है। अनेक पीठों पर यह रिवाज है कि देवी के दर्शन के बाद भैरव के दर्शन किए जाएँ, अन्यथा यात्रा अपूर्ण मानी जाती है। भैरव के नाम भी सूचियों के अनुसार बदलते हैं — इसलिए स्थानीय मंदिर की परंपरा को ही प्रमाण मानना उचित है। भैरव के स्वरूपों पर विस्तृत जानकारी अंग्रेजी पृष्ठ Bhairava पर है।
योगिनी मंदिर और अन्य तांत्रिक स्थल
पीठों के अलावा तंत्र से जुड़े कुछ विशिष्ट स्मारक हैं। चौंसठ योगिनी मंदिर प्रायः गोल और खुली छत वाले होते हैं, जिनकी भीतरी दीवार के आलों में योगिनी-प्रतिमाएँ रहती हैं — ओडिशा में हीरापुर और रानीपुर-झरियाल, मध्य प्रदेश में भेड़ाघाट (जबलपुर के निकट), मितावली (मोरेना) और खजुराहो। खजुराहो का उदाहरण आयताकार है। इनका मानक अध्ययन विद्या देहेजिया की Yogini Cult and Temples है; अंग्रेजी में स्थल-वार जानकारी 64 Yogini Temples पृष्ठ पर है।
नौवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच कश्मीर अद्वैत शैव दर्शन का केंद्र रहा, और वहाँ की देवी-परंपरा — खीर भवानी (रग्न्या देवी) और श्रीनगर के हारी पर्वत पर शारिका देवी — आज भी जीवित है। दक्षिण भारत में कांचीपुरम की कामाक्षी, मदुरै की मीनाक्षी, कोल्लूर की मूकाम्बिका और केरल के कोडुंगल्लूर तथा चोट्टानिक्करा देवी-मंदिर शाक्त परंपरा के बड़े केंद्र हैं।
दर्शन के समय ध्यान रखने योग्य बातें
ये स्थान संग्रहालय नहीं, जीवित मंदिर हैं। शालीन वस्त्र पहनें, फोटोग्राफी और प्रवेश के स्थानीय नियमों का पालन करें, और वहाँ के साधकों तथा पुजारियों की परंपरा का आदर करें। कई पीठों पर स्थानीय आचार — जैसे किसी विशेष द्वार से प्रवेश या भैरव-दर्शन का क्रम — निश्चित है; मंदिर प्रशासन की सूचना ही अंतिम मानें।
व्यावहारिक जानकारी के लिए यात्रा से पहले वर्तमान समय-सारणी, मौसम और मेले की तिथियाँ मंदिर की आधिकारिक घोषणा या राज्य पर्यटन विभाग से देख लें — विशेष रूप से अंबुबाची जैसे अवसरों पर, जब भीड़ बहुत बढ़ जाती है। तंत्र-बाधा दूर करने या कोई “सिद्धि” दिलाने का दावा करने वाले दलालों से दूरी रखें; यह हर बड़े तीर्थ की सामान्य समस्या है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शक्तिपीठ कितने हैं?
इसका एक निश्चित उत्तर नहीं है। सबसे प्रचलित संख्या 51 है, पर ग्रंथ 4, 18, 51, 52, 64 और 108 — सब बताते हैं। आरंभिक तांत्रिक ग्रंथ चार महापीठ गिनाते हैं, अष्टादश शक्तिपीठ स्तोत्र अठारह, पीठनिर्णय की सूची इक्यावन और देवी भागवत पुराण एक सौ आठ। इसलिए किसी भी एक सूची को अंतिम मानना ठीक नहीं।
शक्तिपीठ क्या हैं?
शक्तिपीठ का अर्थ है देवी का आसन या स्थान। परंपरा के अनुसार ये वे तीर्थ हैं जहाँ सती के शरीर के अंग या आभूषण गिरे थे। प्रत्येक पीठ पर देवी किसी स्थानीय नाम से पूजी जाती हैं और उनके साथ शिव का एक रक्षक रूप, भैरव, जुड़ा होता है। शाक्त और तांत्रिक परंपरा में ये सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ माने जाते हैं।
51 शक्तिपीठ की सूची प्रामाणिक है?
51 की संख्या सबसे लोकप्रिय है और उसे संस्कृत वर्णमाला के इक्यावन अक्षरों से जोड़ा जाता है, पर वह भी एक परंपरा है, अंतिम प्रमाण नहीं। अलग-अलग सूचियों में स्थान और अंग बदलते हैं, और एक ही अंग का दावा कई मंदिर करते हैं। इसलिए इंटरनेट पर मिलने वाली किसी भी पूरी सूची को सावधानी से पढ़ें।
सबसे प्रमुख शक्तिपीठ कौन सा है?
तांत्रिक परंपरा में गुवाहाटी की नीलाचल पहाड़ी पर स्थित कामाख्या को सबसे प्रमुख पीठ माना जाता है, जहाँ गर्भगृह में प्रतिमा नहीं बल्कि एक प्राकृतिक शिला-दरार की पूजा होती है। अलग-अलग परंपराओं में कालीघाट, ज्वालामुखी, विंध्यवासिनी और दक्षिण भारत के अठारह पीठ भी सर्वोपरि माने जाते हैं।
भारत के बाहर कौन-कौन शक्तिपीठ हैं?
प्रचलित सूचियों में पाकिस्तान के बलूचिस्तान की हिंगलाज, बांग्लादेश की जशोरेश्वरी और चंद्रनाथ (सीताकुंड), नेपाल में पशुपतिनाथ के निकट गुह्येश्वरी, तथा तिब्बत में मानसरोवर के पास मानसा शामिल हैं। श्रीलंका के कुछ स्थानों को भी कुछ सूचियाँ गिनती हैं। इन सबके अंग-संबंध सूची के अनुसार बदलते हैं।
शक्तिपीठ के भैरव कौन होते हैं?
परंपरा प्रत्येक शक्तिपीठ के साथ शिव के एक रूप को जोड़ती है, जिसे उस पीठ का भैरव कहा जाता है। वे उस स्थान के रक्षक माने जाते हैं, और अनेक पीठों पर देवी के दर्शन के बाद भैरव के दर्शन की परंपरा है। भैरव के नाम भी सूचियों के अनुसार बदलते हैं, इसलिए स्थानीय परंपरा ही सबसे भरोसेमंद मानी जाती है।
क्या वैष्णो देवी शक्तिपीठ है?
वैष्णो देवी भारत के सबसे अधिक दर्शन किए जाने वाले देवी-स्थानों में है, पर 51 पीठों की प्रचलित सूची में उसका नाम आमतौर पर नहीं आता; कुछ परंपराएँ उसे पीठ मानती हैं। इससे उसका धार्मिक महत्व कम नहीं होता। किसी मंदिर का महत्व किसी विशेष सूची में आने पर निर्भर नहीं है।
स्रोत एवं अधिक पढ़ने के लिए
- D. C. Sircar, The Śākta Pīṭhas, Motilal Banarsidass (द्वितीय संशोधित संस्करण, 1973).
- Hugh B. Urban, The Power of Tantra: Religion, Sexuality and the Politics of South Asian Studies, I.B. Tauris, 2010.
- June McDaniel, Offering Flowers, Feeding Skulls: Popular Goddess Worship in West Bengal, Oxford University Press, 2004.
- Vidya Dehejia, Yogini Cult and Temples: A Tantric Tradition, National Museum, New Delhi, 1986.
- David Kinsley, Hindu Goddesses: Visions of the Divine Feminine in the Hindu Religious Tradition, University of California Press, 1986.
- प्राथमिक स्रोत: कालिका पुराण, देवी भागवत पुराण, योगिनी तंत्र और पीठनिर्णय (तंत्रचूड़ामणि); अनुवादों के लिए पठन-सूची देखें।