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बगलामुखी माता: स्वरूप, स्तंभन, मंत्र और मंदिर
बगलामुखी
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बगलामुखी दस महाविद्याओं में आठवीं देवी हैं। उन्हें पीतांबरा यानी “पीले वस्त्रों वाली” भी कहा जाता है। वे स्तंभन की देवी मानी जाती हैं — उस शक्ति की, जो गति को रोक देती है — और चित्रों में पीत वर्ण, हाथ में गदा तथा एक असुर की जिह्वा पकड़े दिखाई जाती हैं। भक्त उन्हें शत्रुतापूर्ण वाणी, हानिकारक शक्तियों और अपने ही चंचल मन को स्थिर करने वाली देवी के रूप में देखते हैं।
लोक-भक्ति में बगलामुखी माता से विवाद, मुकदमे और प्रतियोगिता में सहायता की प्रार्थना बहुत की जाती है, और मध्य प्रदेश के दतिया स्थित उनका मंदिर देश के सबसे व्यस्त महाविद्या-स्थलों में है। इस पृष्ठ पर उनका स्वरूप, कथाएँ, दस महाविद्याओं में स्थान, स्तंभन से जुड़ी परंपरागत मान्यताएँ और उनकी सीमाएँ, मंत्र-दीक्षा के नियम तथा प्रमुख मंदिर — सब क्रम से दिए गए हैं। यहाँ जो भी मान्यताएँ बताई गई हैं, वे मान्यताएँ हैं, वचन नहीं।

बगलामुखी नाम का अर्थ क्या है?
लोक-प्रचलित व्याख्या बक या बगुला शब्द से चलती है — इस पाठ में बगलामुखी यानी “बगुले जैसे मुख वाली”। मछली की प्रतीक्षा में पूरी तरह निश्चल खड़ा बगुला एकाग्रता का जाना-पहचाना चित्र है, और कुछ चित्रों में उनके पास बगुला दिखाया भी जाता है।
दूसरी व्युत्पत्ति, जिसका उल्लेख किन्सले करते हैं, वल्गा यानी लगाम से है: वल्गामुखी से बगलामुखी, अर्थात् “वह, जिसके मुख में रोक लगाने की शक्ति है”। उनका दूसरा प्रसिद्ध नाम पीतांबरा उनके पीले वस्त्रों से आया है, और पीला रंग उनकी पूरी उपासना में चलता है — पीले फूल, पीले वस्त्र, हल्दी और हल्दी की माला।
बगलामुखी का स्वरूप और प्रतीक
नीचे की तालिका में उनके मूर्ति-विधान के मुख्य तत्व और परंपरा में दी जाने वाली व्याख्या है। क्षेत्र और ग्रंथ के अनुसार विवरण बदलते हैं।
| तत्व | परंपरा में दिया गया अर्थ |
|---|---|
| सुनहरा-पीत वर्ण और पीत वस्त्र | हल्दी, स्वर्ण और पृथ्वी तत्व का संकेत — स्थिरता और अचलता; साथ ही राजसी और मांगलिक भाव |
| असुर की जिह्वा पकड़ना | झूठी, हानिकारक या अहंकारी वाणी को उसके स्रोत पर ही रोक देना |
| उठी हुई गदा (मुद्गर) | बाधा और शत्रुता के सामने निर्णायक बल |
| समुद्र के बीच रत्न-सिंहासन या पीत कमल | उथल-पुथल के बीच अविचल, संप्रभु शांति |
| बगुला (कुछ चित्रों में) | एकाग्रता और पूर्ण निश्चलता |
| दो या चार भुजाएँ | द्विभुज रूप संयम पर जोर देता है; चतुर्भुज रूप में पाश और अन्य आयुध जुड़ जाते हैं |
जिस असुर को वे पकड़े हुए हैं, उसका नाम लोक-कथाओं में प्रायः मदन बताया जाता है। वह छोटा और विवश दिखाया जाता है, और कुछ चित्रों में उसके चेहरे पर क्रोध नहीं, भक्ति का भाव होता है — यह संकेत कि रोक दंड नहीं, सुधार है।
बगलामुखी की कथा और उत्पत्ति
प्रलयंकारी तूफान की कथा
सबसे प्रचलित कथा कहती है कि किसी युग में एक महातूफान सृष्टि को नष्ट करने पर उतर आया। विष्णु ने हरिद्रा सरोवर नामक हल्दी-रंग के जलाशय के पास तप किया, जिसे लोक-परंपरा सौराष्ट्र (गुजरात) में मानती है। उसी सरोवर से देवी बगलामुखी प्रकट हुईं और अपनी स्तंभन-शक्ति से तूफान को थाम लिया। यह कथा उनके पीत वर्ण और उनकी रोकने की शक्ति — दोनों की व्याख्या करती है।
मदन असुर की कथा
दूसरी लोकप्रिय कथा में मदन नाम के असुर को वाक् सिद्धि मिल गई थी, यानी वह जो कह दे वही हो जाए। उसने इस शक्ति का दुरुपयोग शुरू किया, तब देवी ने उसकी जिह्वा पकड़कर उसे रोक दिया। पराजित होकर उसने देवी के साथ पूजे जाने का वर माँगा, जो उसे मिल गया — इसीलिए वह उनके चित्रों में उनके पास दिखाई देता है।
सती के दस रूपों में एक
महाभागवत पुराण में वे उन दस रूपों में से एक हैं जो सती ने दक्ष के यज्ञ से पहले शिव के सामने प्रकट किए। ध्यान रहे कि सरोवर और असुर वाली कथाएँ मुख्यतः बाद के भक्ति-साहित्य और स्थानीय परंपरा से आती हैं, प्रारंभिक संस्कृत ग्रंथों से नहीं।
स्तंभन क्या है? परंपरा का दावा और इस पृष्ठ की सीमा
यह वह प्रश्न है जिसके साथ अधिकांश पाठक इस पृष्ठ तक पहुँचते हैं, इसलिए इसका उत्तर सीधा दिया जा रहा है।
इतिहास की दृष्टि से: मध्यकालीन तांत्रिक पद्धति-ग्रंथ अनुष्ठान के उद्देश्यों को छह वर्गों — षट्कर्म — में बाँटते हैं: शांति, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन और मारण। तंत्र के इतिहासकार, जैसे ह्यू अर्बन, बताते हैं कि मुक्ति के साथ-साथ ऐसे सांसारिक उद्देश्य भी पूर्व-आधुनिक साधना का वास्तविक हिस्सा थे। इस वर्गीकरण में बगलामुखी स्तंभन से सबसे अधिक जुड़ी देवी बन गईं। यह ऐतिहासिक तथ्य है — अर्थात् ग्रंथों में यह लिखा मिलता है — न कि इस बात का प्रमाण कि ऐसा होता है।
आज की लोक-मान्यता: भक्त उनसे शत्रुओं से रक्षा, वाद-विवाद और परीक्षा में सफलता तथा मुकदमों और चुनावों में अनुकूल परिणाम की प्रार्थना करते हैं। चुनाव से पहले नेताओं के दतिया जाने की खबरें भारतीय मीडिया में आती रही हैं। ये परंपरागत और लोकप्रिय मान्यताएँ हैं, सिद्ध तथ्य नहीं।
इस वेबसाइट की स्पष्ट स्थिति: यहाँ किसी व्यक्ति को रोकने, वश में करने, हानि पहुँचाने या किसी मुकदमे का परिणाम बदलने के लिए कोई विधि, अनुष्ठान, संकल्प या प्रयोग नहीं दिया जाता — न इस पृष्ठ पर, न कहीं और। हम ऐसी किसी क्रिया का समर्थन भी नहीं करते। इसका कारण केवल कानून या नीति नहीं है: किसी की सहमति के बिना उस पर कुछ करने का प्रयास परंपरा के अपने नैतिक ढाँचे में भी नहीं बैठता, जो सत्य, अहिंसा और संयम को साधना की शर्त बताता है।
अगर आप डर में हैं, तो यह पढ़िए
बहुत से लोग इस देवी तक तब पहुँचते हैं जब उन्हें लगता है कि किसी ने उन पर “कुछ करा दिया है”, या जब कोई उन्हें ऐसा कहकर डरा रहा है। यह डर असली होता है और उसका मज़ाक नहीं बनाया जाना चाहिए। पर यह भी सच है कि इस डर पर एक पूरा धंधा टिका हुआ है — जो व्यक्ति मोटी रकम माँगे, गुप्त अनुष्ठान के नाम पर अकेले बुलाए, डॉक्टर के पास जाने से रोके या परिवार के किसी सदस्य को दोषी बताकर घर में फूट डाले, वह अपराध की ओर बढ़ रहा है, साधना की ओर नहीं। इस पूरे चक्र को तांत्रिक विद्या पृष्ठ पर हिंदी में और अंग्रेजी में Fear of Black Magic पृष्ठ पर विस्तार से समझाया गया है।
भीतरी अर्थ: जो शत्रु अपना ही मन है
अनेक आचार्य स्तंभन का आंतरिक पाठ देते हैं, और परंपरा में यही पाठ सबसे ऊँचा माना जाता है। जिस “शत्रु” की जिह्वा देवी पकड़ती हैं, वह अपना ही बेचैन मन है — निंदा, बड़बड़ाहट, अपने आप से बोला गया झूठ। तब स्तंभन का अर्थ वही ठहराव है जिसे ध्यान खोजता है। महाविद्या-क्रम में यह स्थिरता धूमावती की शून्यता के बाद आती है और मातंगी की प्रेरित वाणी की भूमि तैयार करती है — पहले मौन, फिर सार्थक बोल।
बगलामुखी का बीज मंत्र, यंत्र और साधना के नियम
उनका बीजाक्षर व्यापक रूप से ह्लीं बताया जाता है; यही एक अक्षर है जो लगभग हर प्रकाशित स्रोत में समान मिलता है। उनका मुख्य मूल मंत्र लगभग छत्तीस अक्षरों का एक लंबा सूत्र है, जो अनेक भक्ति-पुस्तकों में छपा है और जिसमें “दुष्टों” की वाणी, गति और बुद्धि को स्तंभित करने की प्रार्थना है। वह लंबा मंत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। इसके दो कारण हैं: एक, हर परंपरा इस पर एकमत है कि वह मंत्र गुरु से दीक्षा लेकर और उन्हीं की देखरेख में ही ग्रहण किया जाता है; दो, उसे संदर्भ के बिना छाप देना उसी दिशा में धकेलता है जिससे यह पृष्ठ बचना चाहता है।
जप की संख्या, संकल्प, अनुष्ठान का क्रम और विशेष प्रयोग भी यहाँ जान-बूझकर नहीं दिए गए हैं। दीक्षा और गुरु-परंपरा की कसौटियाँ अंग्रेजी में Guru & Diksha पृष्ठ पर हैं, और मंत्र-यंत्र का सामान्य ढाँचा Practices पृष्ठ पर।
सामान्य भक्ति-व्यवहार में पीला रंग सर्वत्र रहता है — पीले वस्त्र, पीले फूल, हल्दी, पीली मिठाई और हल्दी की माला; कुछ भक्त गुरुवार को विशेष मानते हैं। उनका यंत्र प्रायः धातु पर उकेरा जाता है और उसमें केंद्रीय त्रिकोण, वृत्त, कमल-दल तथा चौकोर भूपुर होते हैं — वही रचना जो अन्य तांत्रिक यंत्रों की है, और उसे भी देवी का ही स्वरूप मानकर पूजा जाता है।
बगलामुखी के प्रमुख मंदिर
पीतांबरा पीठ, दतिया (मध्य प्रदेश) बगलामुखी उपासना का सबसे प्रसिद्ध केंद्र है। इसकी स्थापना बीसवीं शताब्दी में एक संन्यासी ने की, जिन्हें भक्त स्वामीजी महाराज कहते हैं। परिसर में बगलामुखी पीतांबरा देवी के रूप में विराजमान हैं, धूमावती का अलग मंदिर है, और वनखंडेश्वर नाम का एक प्राचीन शिव मंदिर भी है। नवरात्रि में यहाँ विशेष भीड़ रहती है।
नलखेड़ा (मध्य प्रदेश) का बगलामुखी मंदिर मालवा क्षेत्र में लखुंदर नदी के तट पर है और बहुत पुराना माना जाता है। बनखंडी, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) का बगलामुखी मंदिर पहाड़ी क्षेत्र का प्रमुख केंद्र है। इन तीनों का विस्तृत विवरण अंग्रेजी में Bagalamukhi Temples गाइड में है। असम के कामाख्या परिसर में वे दस महाविद्याओं के साथ पूजित हैं, और देवी के अन्य तीर्थों के लिए शक्तिपीठ पृष्ठ देखें।
बगलामुखी जयंती कब होती है?
बगलामुखी जयंती सामान्यतः वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मानी जाती है। यह तिथि चंद्र-पंचांग से तय होती है, इसलिए अंग्रेजी कैलेंडर में इसका दिन हर वर्ष बदलता है — सही तारीख के लिए पंचांग या मंदिर की आधिकारिक सूचना देखें।
वर्ष में दो बार आने वाली गुप्त नवरात्रि भी उनकी उपासना का पारंपरिक काल मानी जाती है, और दतिया तथा नलखेड़ा में इन दिनों विशेष अनुष्ठान होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
बगलामुखी माता कौन हैं?
बगलामुखी माता, जिन्हें पीतांबरा भी कहा जाता है, दस महाविद्याओं में आठवीं देवी हैं। वे पीत वस्त्रों में, हाथ में गदा लिए और एक असुर की जिह्वा पकड़े दिखाई जाती हैं। परंपरा उन्हें स्तंभन यानी रोक देने की शक्ति की देवी मानती है, और भक्त उन्हें शत्रुतापूर्ण वाणी तथा अपने चंचल मन को स्थिर करने वाली देवी के रूप में देखते हैं।
बगलामुखी का मंत्र क्या है?
उनका बीजाक्षर व्यापक रूप से “ह्लीं” बताया जाता है। उनका लगभग छत्तीस अक्षरों वाला लंबा मूल मंत्र अनेक भक्ति-पुस्तकों में छपा है, पर यह पृष्ठ उसे नहीं दे रहा, क्योंकि हर परंपरा मानती है कि वह मंत्र गुरु से दीक्षा लेकर ही ग्रहण किया जाता है। किसी भी मंत्र को किसी विवाद या परिणाम की गारंटी नहीं मानना चाहिए।
क्या बगलामुखी की पूजा से शत्रु का नाश होता है?
यह एक परंपरागत और लोकप्रिय मान्यता है, सिद्ध तथ्य नहीं। ग्रंथों में स्तंभन का उल्लेख अवश्य मिलता है, पर यह वेबसाइट किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई विधि नहीं देती और न ऐसी क्रिया का समर्थन करती है। परंपरा का अपना नैतिक ढाँचा भी किसी की सहमति के बिना उस पर कुछ करने को स्वीकार नहीं करता। अनेक आचार्य “शत्रु” को अपना ही अस्थिर मन बताते हैं।
क्या कोर्ट केस में बगलामुखी की उपासना से जीत मिलती है?
भक्तों में यह मान्यता प्रचलित है कि बगलामुखी विवाद, मुकदमे और प्रतियोगिता में सहायक हैं, क्योंकि वे स्तंभन से जुड़ी हैं। यह श्रद्धा है, परिणाम की गारंटी नहीं। कानूनी मामला योग्य वकील और सही दस्तावेज़ों से लड़ा जाता है, और किसी भी अनुष्ठान को उसका विकल्प मानना नुकसानदेह हो सकता है।
क्या बगलामुखी की साधना से वशीकरण किया जा सकता है?
यह पृष्ठ किसी व्यक्ति को वश में करने, रोकने या हानि पहुँचाने की कोई विधि नहीं देता और ऐसे किसी प्रयोग का समर्थन नहीं करता। जो लोग पैसे लेकर ऐसे “प्रयोग” कराने का दावा करते हैं, वे लगभग सभी मामलों में ठगी कर रहे होते हैं। किसी भी भुगतान से पहले घर के किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें, और दबाव या धमकी की स्थिति में 112 पर पुलिस से संपर्क करें।
पीतांबरा पीठ कहाँ है?
पीतांबरा पीठ मध्य प्रदेश के दतिया में है, जो ग्वालियर और झाँसी के पास पड़ता है। इसकी स्थापना बीसवीं शताब्दी में एक संन्यासी ने की थी, जिन्हें भक्त स्वामीजी महाराज कहते हैं। परिसर में बगलामुखी पीतांबरा देवी के रूप में विराजमान हैं, साथ में धूमावती का मंदिर और वनखंडेश्वर शिव मंदिर भी है।
बगलामुखी का पीले रंग से क्या संबंध है?
उनका नाम पीतांबरा का अर्थ ही है “पीले वस्त्रों वाली”। उनकी उपासना में पीले वस्त्र, पीले फूल, हल्दी और हल्दी की माला का प्रयोग होता है। एक प्रचलित कथा कहती है कि वे हल्दी के रंग वाले हरिद्रा सरोवर से प्रकट हुई थीं। पीला रंग परंपरा में पृथ्वी तत्व और स्थिरता से भी जोड़ा जाता है।
बगलामुखी के प्रसिद्ध मंदिर कौन-से हैं?
सबसे प्रसिद्ध मंदिर मध्य प्रदेश के दतिया स्थित पीतांबरा पीठ और उसी राज्य के नलखेड़ा का बगलामुखी मंदिर हैं। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले में बनखंडी का बगलामुखी मंदिर भी प्रमुख है। असम के कामाख्या परिसर में वे दस महाविद्याओं के साथ पूजित हैं।
स्रोत एवं अधिक पढ़ने के लिए
- David Kinsley, Tantric Visions of the Divine Feminine: The Ten Mahāvidyās, University of California Press, 1997.
- Hugh B. Urban, The Power of Tantra: Religion, Sexuality and the Politics of South Asian Studies, I.B. Tauris, 2010.
- Madhu Khanna, Yantra: The Tantric Symbol of Cosmic Unity, Thames & Hudson, 1979.
- S. Shankaranarayanan, The Ten Great Cosmic Powers, 1972.
- प्राथमिक स्रोत: महाभागवत पुराण में सती के दस रूपों का प्रसंग; अनुवादों के लिए पठन-सूची देखें।