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दुर्गा सप्तशती: अध्याय, चरित्र और नवार्ण मंत्र

दुर्गा सप्तशती

Loading...अंतिम अद्यतन: 23 सितंबर 2026

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दुर्गा सप्तशती देवी की महिमा का वह ग्रंथ है जिसमें सात सौ श्लोक, तीन चरित्र और तेरह अध्याय हैं; मूल रूप से यह मार्कंडेय पुराण का एक भाग है और उसका शास्त्रीय नाम देवी माहात्म्य है। इसमें देवी तीन बार प्रकट होकर मधु-कैटभ, महिषासुर तथा शुंभ-निशुंभ का वध करती हैं, और अंततः उन्हें ही परम शक्ति बताया जाता है।

शाक्त परंपरा में इस ग्रंथ की वही स्थिति है जो वैष्णवों में गीता की है — नवरात्रि में इसका पाठ होता है, मंदिरों में चंडी-पाठ का आयोजन होता है, और इसके अनेक श्लोक स्वतंत्र स्तोत्र की तरह प्रसिद्ध हैं। यह पृष्ठ बताता है कि यह ग्रंथ क्या है, इसकी संरचना कैसी है, कवच-अर्गला-कीलक और रात्रि सूक्त जैसे अंग क्या हैं, नवार्ण मंत्र का अर्थ क्या है, और विश्वसनीय संस्करण कौन से हैं।

दुर्गा सप्तशती क्या है?

सप्तशती का अर्थ है “सात सौ” — सात सौ श्लोकों का वह संग्रह जिसमें देवी की महिमा गाई गई है। यही ग्रंथ संस्कृत परंपरा में देवी माहात्म्य कहलाता है, यानी “देवी की महिमा”, और उत्तर भारत में इसे प्रायः चंडी या चंडी पाठ कहा जाता है। तीनों नाम एक ही रचना के हैं।

यह कोई स्वतंत्र ग्रंथ नहीं, बल्कि मार्कंडेय पुराण के भीतर आने वाला एक खंड है, जो बहुत पहले से अलग ग्रंथ की तरह पढ़ा और छापा जाता रहा है। विद्वान इसे सामान्यतः पाँचवीं से छठी शताब्दी के आसपास की रचना मानते हैं, और इसका महत्व इसी में है: यह वह पहला उपलब्ध संस्कृत ग्रंथ है जो देवी को किसी देवता की शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि स्वयं परम तत्व के रूप में प्रस्तुत करता है। थॉमस कोबर्न, जिन्होंने इस ग्रंथ पर सबसे विस्तृत अंग्रेजी अध्ययन किया है, इसे भारतीय धर्म-इतिहास में देवी-परंपरा के “स्फटिकीकरण” का क्षण कहते हैं — वह बिंदु जहाँ बिखरी हुई देवी-धाराएँ एक धर्मशास्त्रीय दृष्टि में जुड़ जाती हैं।

कथा का ढाँचा एक कथा के भीतर कथा का है। राज्य से वंचित राजा सुरथ और ठगे जाने पर घर से निकाले गए वैश्य समाधि, दोनों वन में मेधा ऋषि के आश्रम पहुँचते हैं। दोनों को यह आश्चर्य है कि जिन लोगों ने उन्हें छला, उन्हीं के लिए मन में मोह क्यों बचा है। ऋषि उत्तर में महामाया की व्याख्या करते हैं और फिर देवी की तीन कथाएँ सुनाते हैं। यही तीन कथाएँ ग्रंथ के तीन चरित्र हैं।

तीन चरित्र कौन से हैं?

पूरा ग्रंथ तीन भागों में बँटा है, जिन्हें चरित्र कहा जाता है। हर चरित्र की अपनी देवी, अपना ऋषि और अपना छंद बताया जाता है — यह विभाजन पाठ-विधि में भी काम आता है, क्योंकि अनेक परंपराएँ चरित्र के अनुसार पाठ बाँटती हैं।

चरित्रअध्यायमुख्य कथादेवी स्वरूप
प्रथम चरित्र1विष्णु की योगनिद्रा और मधु-कैटभ का वधमहाकाली
मध्यम चरित्र2–4महिषासुर और उसकी सेना का वधमहालक्ष्मी
उत्तम चरित्र5–13शुंभ-निशुंभ, धूम्रलोचन, चंड-मुंड और रक्तबीज का वधमहासरस्वती

तीनों कथाओं का ढाँचा एक जैसा है और यही उनका संदेश है: असुर शक्ति पाकर देवताओं को पराजित करते हैं, देवता देवी की शरण में जाते हैं, देवी प्रकट होती हैं, युद्ध होता है, और वे विजयी होकर यह स्मरण कराती हैं कि वही एक शक्ति सब रूपों में है। उत्तम चरित्र में यह बात सबसे स्पष्ट होती है, जहाँ देवी अपनी ही शक्तियों — मातृकाओं और काली — को प्रकट करती हैं और फिर उन्हें अपने में समेट लेती हैं, यह कहते हुए कि संसार में उनके अतिरिक्त कोई दूसरी नहीं।

दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्याय

अध्यायों के नाम संस्करणों में थोड़े भिन्न हो सकते हैं, पर क्रम और विषय सर्वत्र एक ही हैं।

अध्यायविषयचरित्र
1सुरथ और समाधि की कथा; मेधा ऋषि का उपदेश; मधु-कैटभ वधप्रथम
2देवताओं के तेज से देवी का प्राकट्य; महिषासुर की सेना का वधमध्यम
3महिषासुर का वधमध्यम
4शक्रादि स्तुति — इंद्र आदि देवताओं द्वारा देवी की स्तुतिमध्यम
5शुंभ-निशुंभ का प्रसंग; “या देवी सर्वभूतेषु” वाली स्तुति; दूत का संवादउत्तम
6धूम्रलोचन का वधउत्तम
7चंड और मुंड का वध; देवी के क्रोध से काली का प्राकट्य और चामुंडा नामउत्तम
8रक्तबीज का वध; मातृकाओं का प्राकट्यउत्तम
9निशुंभ का वधउत्तम
10शुंभ का वध; देवी का यह कथन कि वे अकेली ही सब कुछ हैंउत्तम
11नारायणी स्तुति; देवी द्वारा भविष्य में पुनः प्रकट होने का वचनउत्तम
12पाठ की महिमा और देवी के वचनउत्तम
13सुरथ और समाधि को देवी का वरदान; कथा का समापनउत्तम

सातवें और आठवें अध्याय पर विशेष ध्यान दिया जाता है, क्योंकि यहीं काली देवी के क्रोध से प्रकट होती हैं और चंड-मुंड के वध के बाद चामुंडा कहलाती हैं, तथा रक्तबीज-प्रसंग में सप्तमातृकाएँ प्रकट होती हैं। शाक्त और तांत्रिक परंपरा की अनेक धाराएँ इन्हीं प्रसंगों से अपना सूत्र जोड़ती हैं।

कवच, अर्गला, कीलक और रात्रि सूक्त

मुद्रित दुर्गा सप्तशती में मूल तेरह अध्यायों के साथ कुछ और रचनाएँ भी छपती हैं, जिन्हें परंपरा पाठ के अंग मानती है। नए पाठक प्रायः इन्हें देखकर भ्रमित होते हैं, इसलिए इनका संक्षिप्त परिचय उपयोगी है।

अंगक्या है
देवी कवचदेवी से रक्षा की प्रार्थना करने वाला स्तोत्र, जिसमें शरीर के अंग-अंग पर देवी के विभिन्न स्वरूपों का न्यास है; नवदुर्गा — शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक — की प्रसिद्ध सूची इसी में मिलती है
अर्गला स्तोत्र“अर्गला” यानी अर्गल या सिटकिनी; पाठ का वह अंग जो प्रार्थना का द्वार खोलता माना जाता है
कीलक स्तोत्र“कील” यानी खूँटा; परंपरा के अनुसार यह उस बंधन को खोलता है जो पाठ के फल को रोके रखता है
रात्रि सूक्तऋग्वेद की रात्रि-देवी से जुड़ी ऋचाओं पर आधारित; पाठ के आरंभ में पढ़ा जाता है और देवी को रात्रि-रूप में स्मरण करता है
देवी सूक्तऋग्वेद का वह प्रसिद्ध सूक्त जिसमें वाक् स्वयं अपने सर्वव्यापी होने की घोषणा करती हैं; प्रायः पाठ के अंत में
रहस्य-त्रयअंत में आने वाले तीन रहस्य — प्राधानिक, वैकृतिक और मूर्ति रहस्य — जो देवी के स्वरूपों की दार्शनिक व्याख्या करते हैं

ये अंग मूल देवी माहात्म्य के भाग नहीं हैं; ये बाद में पाठ-परंपरा के साथ जुड़े और आज लगभग हर संस्करण में साथ छपते हैं। कुछ परंपराएँ सबका पाठ करती हैं, कुछ केवल मूल अध्यायों का।

नवार्ण मंत्र का अर्थ

दुर्गा सप्तशती से सबसे गहराई से जुड़ा मंत्र नवार्ण मंत्र है — ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चेनवार्ण का अर्थ है नौ अक्षर, और परंपरा इसे इसी गणना से यह नाम देती है। यह मंत्र सदियों से मुद्रित संस्करणों, स्तोत्र-संग्रहों और सार्वजनिक पाठ में उपलब्ध रहा है, इसलिए इसे यहाँ देने में कोई गोपनीयता का प्रश्न नहीं।

अंशपरंपरा में दी गई व्याख्या
ऐंसरस्वती या वाग्-बीज; ज्ञान और वाणी से जोड़ा गया
ह्रींमाया-बीज या भुवनेश्वरी बीज; शक्ति और सृष्टि की व्यापकता से जोड़ा गया
क्लींकाम-बीज; आकर्षण और इच्छा-शक्ति से जोड़ा गया
चामुण्डायै“चामुंडा को” — चंड और मुंड के वध के बाद देवी को मिला नाम
विच्चेपारंपरिक रूप से नमन या समर्पण-सूचक अंश माना जाता है; टीकाकारों ने इसके कई अर्थ दिए हैं

तीन बीजों को तीन चरित्रों की तीन देवियों — महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती — से जोड़ने की व्याख्या भी प्रचलित है। यह ध्यान रखना चाहिए कि बीज मंत्रों के अर्थ शब्दकोश की तरह निश्चित नहीं होते; ये परंपरागत व्याख्याएँ हैं, और अलग-अलग तंत्रों तथा टीकाकारों में भिन्न मिलती हैं।

जप की संख्या, पुरश्चरण और दीक्षा। परंपरा में इस मंत्र का संख्या-बद्ध अनुष्ठान, जिसे पुरश्चरण कहा जाता है, गुरु से दीक्षा लेकर ही किया जाता है — क्योंकि उसमें मंत्र के साथ उसकी विधि, न्यास, नियम और समापन का क्रम भी दिया जाता है। इसीलिए इस पृष्ठ पर न कोई जप-संख्या बताई गई है, न कोई विधि, और न किसी फल का वादा किया गया है। गुरु और दीक्षा पृष्ठ पर इस परंपरा का विस्तृत विवरण है।

दुर्गा सप्तशती का पाठ कैसे किया जाता है?

नीचे जो बताया गया है वह परंपरा का विवरण है, कोई विधि-निर्देश नहीं। पाठ की शैली संप्रदाय, क्षेत्र और परिवार के अनुसार भिन्न होती है, और सबसे भरोसेमंद मार्गदर्शन अपने घर या मंदिर की चली आ रही परंपरा तथा किसी योग्य व्यक्ति का मार्गदर्शन ही है।

  • नवरात्रि में पाठ — सबसे प्रचलित प्रथा। कोई पूरे ग्रंथ को नौ दिनों में बाँटकर पढ़ता है, कोई प्रतिदिन एक पूर्ण पाठ करता है। नवरात्रि और गुप्त नवरात्रि दोनों में यह परंपरा चलती है।
  • चंडी पाठ और शत-चंडी — मंदिरों में सामूहिक पाठ का आयोजन; कई ब्राह्मण मिलकर निश्चित संख्या में पाठ करते हैं, जिसे शत-चंडी या सहस्र-चंडी जैसे नामों से जाना जाता है।
  • अध्याय-आधारित पाठ — जिनके पास समय कम है वे किसी एक अध्याय या केवल स्तुति-अंश, जैसे “या देवी सर्वभूतेषु” वाली स्तुति, का पाठ करते हैं।
  • संपुट पाठ — हर श्लोक के आगे-पीछे कोई एक निश्चित श्लोक या मंत्र जोड़कर पढ़ने की पद्धति, जो विशेष अनुष्ठानों में अपनाई जाती है और जिसके लिए परंपरा मार्गदर्शन आवश्यक मानती है।

उच्चारण को लेकर भी परंपरा सजग रहती है, इसलिए बहुत से पाठक अर्थ सहित हिंदी अनुवाद वाले संस्करण से आरंभ करते हैं और किसी जानकार से शुद्ध उच्चारण सीखते हैं। जो संस्कृत नहीं जानते उनके लिए अनुवाद पढ़ना परंपरा में वर्जित नहीं माना जाता।

विश्वसनीय संस्करण और अनुवाद

इस साइट पर दुर्गा सप्तशती का पूरा मूल पाठ नहीं दिया जाता। इसका कारण सीधा है: यह ग्रंथ सैकड़ों वर्षों से सावधानी से संपादित और मुद्रित होता आया है, और अधकचरी नकल से पाठ में अशुद्धियाँ आती हैं। जिन्हें मूल पाठ चाहिए वे किसी प्रामाणिक मुद्रित संस्करण से ही पढ़ें।

संस्करणकिसके लिए उपयोगी
गीता प्रेस, गोरखपुरदुर्गा सप्तशतीहिंदी पाठकों के लिए सबसे प्रचलित संस्करण; मूल श्लोक, हिंदी अनुवाद और सभी अंग-स्तोत्र एक साथ
श्री रामकृष्ण मठ — स्वामी जगदीश्वरानंद द्वारा अनूदित देवी माहात्म्यम्संस्कृत पाठ के साथ सुबोध अंग्रेजी अनुवाद चाहने वालों के लिए
Thomas B. Coburn, Encountering the Goddess (SUNY Press, 1991)अंग्रेजी में गंभीर अध्ययन — पूरा अनुवाद और पाठ की व्याख्या-परंपरा का विश्लेषण
Thomas B. Coburn, Devī-Māhātmya: The Crystallization of the Goddess Tradition (Motilal Banarsidass, 1984)ग्रंथ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और स्रोतों पर विस्तृत शोध

टीका-परंपरा भी समृद्ध है; संस्कृत में इस ग्रंथ पर अनेक प्राचीन टीकाएँ लिखी गई हैं, जिनमें से कुछ तांत्रिक दृष्टि से पाठ की व्याख्या करती हैं। सामान्य पाठक के लिए ऊपर के चार में से कोई भी पर्याप्त है। अन्य पुस्तकों के लिए पठन-सूची देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती क्या है?

दुर्गा सप्तशती सात सौ श्लोकों का वह ग्रंथ है जिसमें देवी की महिमा और उनकी तीन विजय-कथाएँ हैं। इसका शास्त्रीय नाम देवी माहात्म्य है और यह मूल रूप से मार्कंडेय पुराण का एक भाग है। उत्तर भारत में इसे चंडी या चंडी पाठ भी कहा जाता है। तीनों नाम एक ही रचना के हैं।

दुर्गा सप्तशती में कितने अध्याय और श्लोक हैं?

इसमें तेरह अध्याय और सात सौ श्लोक हैं, जो तीन चरित्रों में बँटे हैं — प्रथम चरित्र में पहला अध्याय, मध्यम चरित्र में दूसरे से चौथे तक, और उत्तम चरित्र में पाँचवें से तेरहवें तक। मुद्रित संस्करणों में इनके साथ कवच, अर्गला, कीलक और रहस्य-त्रय जैसे अंग भी छपते हैं।

तीन चरित्र कौन से हैं?

प्रथम चरित्र में विष्णु की योगनिद्रा और मधु-कैटभ का वध है, जिसकी देवी महाकाली कही जाती हैं। मध्यम चरित्र में महिषासुर-वध है, जिसकी देवी महालक्ष्मी हैं। उत्तम चरित्र में शुंभ-निशुंभ, चंड-मुंड और रक्तबीज का वध है, जिसकी देवी महासरस्वती कही जाती हैं।

नवार्ण मंत्र का क्या अर्थ है?

नवार्ण मंत्र है ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे, और नवार्ण का अर्थ है नौ अक्षर। परंपरा में ऐं को वाणी और ज्ञान का बीज, ह्रीं को माया या शक्ति का बीज और क्लीं को इच्छा का बीज बताया जाता है; चामुण्डायै का अर्थ है चामुंडा को, और विच्चे को समर्पण-सूचक अंश माना जाता है। ये पारंपरिक व्याख्याएँ हैं और टीकाकारों में भिन्न मिलती हैं।

क्या नवार्ण मंत्र का जप बिना दीक्षा के किया जा सकता है?

यह मंत्र सदियों से मुद्रित संस्करणों और सार्वजनिक पाठ में उपलब्ध है, इसलिए इसे जानना कोई गोपनीय बात नहीं। पर संख्या-बद्ध अनुष्ठान यानी पुरश्चरण के लिए परंपरा गुरु से दीक्षा आवश्यक बताती है, क्योंकि उसमें मंत्र के साथ विधि, न्यास और नियम भी दिए जाते हैं। इस पृष्ठ पर न कोई जप-संख्या दी गई है, न किसी फल का वादा।

नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ कैसे किया जाता है?

प्रचलित प्रथाएँ कई हैं। कुछ लोग पूरे ग्रंथ को नौ दिनों में बाँटकर पढ़ते हैं, कुछ प्रतिदिन एक पूर्ण पाठ करते हैं, और मंदिरों में सामूहिक चंडी पाठ या शत-चंडी का आयोजन होता है। जिनके पास समय कम हो वे किसी एक अध्याय या प्रसिद्ध स्तुति-अंश का पाठ करते हैं। यह परंपरा का विवरण है, कोई विधि-निर्देश नहीं।

दुर्गा सप्तशती का सबसे विश्वसनीय संस्करण कौन सा है?

हिंदी पाठकों में गीता प्रेस, गोरखपुर का संस्करण सबसे प्रचलित है, जिसमें मूल श्लोक, अनुवाद और सभी अंग-स्तोत्र एक साथ मिलते हैं। अंग्रेजी में श्री रामकृष्ण मठ का स्वामी जगदीश्वरानंद द्वारा अनूदित देवी माहात्म्यम् और गंभीर अध्ययन के लिए Thomas B. Coburn की पुस्तकें उपयोगी हैं। इस साइट पर पूरा मूल पाठ नहीं दिया जाता।

स्रोत एवं अधिक पढ़ने के लिए

  • Thomas B. Coburn, Devī-Māhātmya: The Crystallization of the Goddess Tradition, Motilal Banarsidass, 1984.
  • Thomas B. Coburn, Encountering the Goddess: A Translation of the Devī-Māhātmya and a Study of Its Interpretation, SUNY Press, 1991.
  • स्वामी जगदीश्वरानंद (अनुवाद), Devī Māhātmyam, Sri Ramakrishna Math, Chennai.
  • दुर्गा सप्तशती, गीता प्रेस, गोरखपुर — मूल श्लोक, हिंदी अनुवाद और अंग-स्तोत्र सहित।
  • David Kinsley, Hindu Goddesses: Visions of the Divine Feminine in the Hindu Religious Tradition, University of California Press, 1986.
  • प्राथमिक स्रोत: मार्कंडेय पुराण का देवी माहात्म्य भाग; अन्य अनुवादों के लिए पठन-सूची देखें।