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काली पूजा 2026 कब है? निशीथ काल का समय, विधि और मंत्र
काली पूजा
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द्रिक पंचांग के अनुसार काली पूजा 2026 में रविवार, 8 नवंबर 2026 को है — कार्तिक मास की अमावस्या, वही रात जिसे शेष भारत में दीपावली के रूप में मनाया जाता है। मुख्य पूजा निशीथ काल में होती है: द्रिक पंचांग के अनुसार कोलकाता में रात 10:55 से 11:46 बजे तक और दिल्ली में रात 11:39 से 12:31 बजे तक। अमावस्या तिथि 8 नवंबर को सुबह 11:27 बजे आरंभ होकर 9 नवंबर को दोपहर 12:31 बजे समाप्त होती है।
काली पूजा, जिसे बंगाल में श्यामा पूजा भी कहा जाता है, शाक्त कैलेंडर का दूसरा सबसे बड़ा पर्व है — दुर्गा पूजा के लगभग तीन सप्ताह बाद। यह पृष्ठ बताता है कि यह पर्व दीपावली से कैसे जुड़ा है, लक्ष्मी पूजा से कैसे अलग है, निशीथ काल का क्या अर्थ है, बंगाल में यह परंपरा कैसे बनी, और तांत्रिक तथा भक्ति पद्धतियों में क्या फर्क है।
काली पूजा 2026 कब है?
नियम स्थिर है: काली पूजा कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को होती है, जिसे दीपान्विता अमावस्या भी कहा जाता है। यह वही अमावस्या है जिस पर दीपावली मनाई जाती है, इसलिए दोनों पर्व हर वर्ष एक ही रात पड़ते हैं।
| विवरण | 2026 |
|---|---|
| तिथि | कार्तिक अमावस्या |
| दिन | रविवार, 8 नवंबर 2026 |
| अमावस्या तिथि आरंभ | 8 नवंबर 2026, सुबह 11:27 बजे |
| अमावस्या तिथि समाप्त | 9 नवंबर 2026, दोपहर 12:31 बजे |
| मुख्य पूजा का काल | निशीथ काल — 8 नवंबर की रात (शहर के अनुसार नीचे देखें) |
| उसी रात अन्यत्र | दीपावली और लक्ष्मी पूजा |
काली पूजा 2026 का समय: शहर के अनुसार निशीथ काल
निशीथ काल स्थानीय सूर्यास्त और सूर्योदय से गिना जाता है, इसलिए पूर्व के शहरों में यह पहले आता है और पश्चिम के शहरों में बाद में। तिथि सबके लिए एक है, समय नहीं। द्रिक पंचांग की बंगाल काली पूजा सूची के अनुसार 8 नवंबर 2026 की रात का निशीथ काल:
| शहर | निशीथ काल (8 नवंबर की रात) | अवधि |
|---|---|---|
| गुवाहाटी | रात 10:41 से 11:33 बजे तक | 52 मिनट |
| कोलकाता | रात 10:55 से 11:46 बजे तक | 51 मिनट |
| पटना | रात 11:07 से 11:59 बजे तक | 52 मिनट |
| नई दिल्ली | रात 11:39 से 12:31 बजे तक (9 नवंबर) | 53 मिनट |
| पुणे | रात 11:53 से 12:44 बजे तक (9 नवंबर) | 51 मिनट |
यह लगभग पचास मिनट का समय पूजा का केंद्र माना जाता है, पूरी पूजा नहीं। व्यवहार में पंडालों और घरों की पूजा रात के पहले पहर में आरंभ होकर भोर तक चलती है, और निशीथ के भीतर मुख्य अर्चना तथा पुष्पांजलि रखी जाती है। सूची में न दिए गए शहर के लिए अपने निकट के शहर का समय मोटा अनुमान देता है; ठीक समय के लिए अपने शहर का पंचांग देखें। अमावस्या तिथि सौर दिन के बीच में आरंभ और समाप्त होती है, इसलिए कुछ वर्षों में पंचांगों के बीच एक दिन का अंतर भी दिख सकता है।
काली चौदस 2026 कब है?
द्रिक पंचांग के अनुसार काली चौदस 2026 में शनिवार, 7 नवंबर को है — काली पूजा से ठीक एक दिन पहले, कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को। चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर को सुबह 10:47 बजे आरंभ होकर 8 नवंबर को सुबह 11:27 बजे समाप्त होती है, और उसी क्षण से अमावस्या लग जाती है। अहमदाबाद के लिए द्रिक पंचांग काली चौदस का मुहूर्त रात 11:58 से 12:49 बजे (8 नवंबर) तक बताता है।
यह एक ही चतुर्दशी है जिसे भारत के अलग-अलग हिस्से अलग नाम और अर्थ देते हैं। गुजरात और आसपास के क्षेत्रों में यह काली चौदस है — महाकाली की उपासना की रात, जिसे परंपरा भय और बुरी शक्तियों को दूर करने से जोड़ती है; कई परिवार इसी दिन हनुमान पूजा भी करते हैं। उत्तर भारत में यह नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली है, जिसे रूप चौदस भी कहते हैं। बंगाल में यह भूत चतुर्दशी है, जिसमें पूर्वजों के लिए चौदह दीप जलाए जाते हैं और चौदह प्रकार के साग खाए जाते हैं।
काली चौदस को लेकर सबसे अधिक भ्रम उसके तांत्रिक पक्ष से है। परंपरा में कुछ दीक्षित साधक इस रात श्मशान में देवी की उपासना करते हैं, और इसी कारण इस दिन के नाम पर “सिद्धि”, “टोटके” और “बुरी नजर उतारने” के प्रयोग खूब बेचे जाते हैं। यह साइट ऐसा कोई प्रयोग नहीं देती; अधिकांश परिवारों के लिए काली चौदस घर की सफाई, दीप, स्नान और देवी के स्मरण का दिन है, और इतना ही उसका सार्वजनिक रूप है।
काली पूजा और दीपावली का क्या संबंध है?
संबंध तिथि का है, कथा का नहीं। कार्तिक अमावस्या वर्ष की सबसे अँधेरी रातों में से एक है, और भारत के अलग-अलग हिस्सों ने इसी रात को अलग-अलग अर्थ दिए हैं। उत्तर और पश्चिम भारत में यह लक्ष्मी और गणेश की पूजा तथा दीपों की रात है; बंगाल, असम और ओडिशा के कुछ भागों में यही रात देवी काली की है।
व्यवहार में दोनों साथ-साथ चलते हैं। बंगाल के घरों में भी दीप जलते हैं, पटाखे चलते हैं और मिठाई बँटती है; अंतर यह है कि जिस समय शेष भारत सो चुका होता है, उस समय पंडालों में काली की पूजा आरंभ होती है। बंगाल में इस रात दीपावली के लिए अलग शब्द भी है — काली पूजा ही मुख्य नाम है, और दीप जलाने की प्रथा को प्रायः पूर्वजों के स्मरण से जोड़ा जाता है, जिसके लिए एक दिन पहले भूत चतुर्दशी मनाई जाती है और चौदह दीप जलाए जाते हैं।
काली पूजा और लक्ष्मी पूजा में क्या अंतर है?
एक ही रात के दो पर्व होने के कारण यह सबसे आम प्रश्न है। अंतर देवी, समय और भाव — तीनों का है।
| पक्ष | लक्ष्मी पूजा (दीपावली) | काली पूजा |
|---|---|---|
| देवी | लक्ष्मी, प्रायः गणेश के साथ | काली, प्रायः दक्षिणाकाली स्वरूप में |
| समय | प्रदोष काल — सूर्यास्त के बाद की संध्या | निशीथ काल — मध्यरात्रि |
| क्षेत्र | उत्तर, पश्चिम और अधिकांश भारत | बंगाल, असम, ओडिशा के कुछ भाग, त्रिपुरा, मिथिला |
| भाव | समृद्धि, शुभ आरंभ, घर का प्रकाश | निर्भयता, काल और मृत्यु का सामना, माँ के रूप में देवी |
| स्थान | घर का पूजा-स्थान और दुकान-प्रतिष्ठान | घर, मंदिर और सार्वजनिक पंडाल; कहीं श्मशान-क्षेत्र भी |
| समापन | दीपदान और आरती | भोर तक चलने वाली पूजा; अगले दिनों में प्रतिमा का विसर्जन |
बंगाल में लक्ष्मी की पूजा भी होती है, पर उसका अपना अलग दिन है — कोजागरी लक्ष्मी पूजा, आश्विन की पूर्णिमा को, दुर्गा पूजा के कुछ ही दिन बाद। इसलिए वहाँ दीपावली की रात लक्ष्मी से नहीं, काली से जुड़ी है।
निशीथ काल में पूजा क्यों होती है?
निशीथ काल रात का वह मध्य भाग है जो सूर्यास्त और सूर्योदय के बीच के समय को आठ भागों में बाँटने पर मध्य में पड़ता है — मोटे तौर पर आधी रात के आसपास। तांत्रिक और शाक्त परंपराएँ इसे उग्र देवी-उपासना के लिए सबसे उपयुक्त काल मानती हैं, और काली की मुख्य पूजा इसी में की जाती है।
इसका कारण देवी के स्वरूप से जुड़ा है। काली का संबंध काल, रात्रि और विलय से है; उनका वर्ण अँधेरे जैसा है और उनकी उपासना का पारंपरिक स्थान श्मशान रहा है। जिस रात चंद्रमा पूरी तरह अनुपस्थित है, उसके सबसे गहरे पहर में उनकी पूजा करना परंपरा की दृष्टि से संगत है — अँधेरे से बचने के बजाय उसी में देवी को देखना। पूजा प्रायः भोर तक चलती है, और उसमें आरती, पुष्पांजलि, चंडी या काली-स्तोत्रों का पाठ और रात भर जागरण शामिल रहते हैं। दीक्षित साधकों के लिए इस रात का एक और स्तर है, जिसकी चर्चा नीचे है।
बंगाल में काली पूजा की परंपरा कैसे बनी?
काली का उल्लेख बहुत पुराना है — देवी माहात्म्य में वे चंड और मुंड का वध करने वाली चामुंडा के रूप में आती हैं, और तांत्रिक ग्रंथ उन्हें दस महाविद्याओं में प्रथम स्थान देते हैं। पर बंगाल में आज जिस रूप में काली पूजा होती है — मिट्टी की बड़ी प्रतिमा, सार्वजनिक पंडाल, कार्तिक अमावस्या की रात — वह अपेक्षाकृत बाद की परंपरा है।
बंगाली परंपरा इस विकास में दो नाम विशेष रूप से याद रखती है। पहला, कृष्णानंद आगमवागीश, तंत्रसार नामक संग्रह-ग्रंथ के रचयिता, जिन्हें परंपरा दक्षिणाकाली के उस स्वरूप से जोड़ती है जो आज बंगाल में सबसे प्रचलित है — शिव पर खड़ी, दाहिना पैर आगे, चार भुजाओं में खड्ग और मुंड, और अभय तथा वर की मुद्राएँ। दूसरा, नदिया के राजा कृष्णचंद्र, जिनके संरक्षण को अठारहवीं शताब्दी में घर-घर काली पूजा फैलने का कारण बताया जाता है। ये पारंपरिक श्रेय हैं, जिनके पीछे किंवदंती और इतिहास दोनों मिले हुए हैं; इतिहासकार इन कथाओं को सावधानी से पढ़ते हैं।
उन्नीसवीं शताब्दी में बंगाल का शाक्त काव्य इस भक्ति को घर-घर पहुँचा चुका था। रामप्रसाद सेन और कमलाकांत भट्टाचार्य जैसे कवियों के श्यामा संगीत ने काली को उग्र देवी से आगे बढ़ाकर माँ के रूप में गाया — वह माँ जिससे भक्त शिकायत भी कर सकता है। आज भी काली पूजा की रात इन्हीं गीतों से भरी रहती है।
रामकृष्ण परमहंस और दक्षिणेश्वर
कोलकाता के काली-केंद्रों में दो सबसे प्रसिद्ध हैं। कालीघाट दक्षिण कोलकाता में आदि गंगा के किनारे स्थित प्राचीन तीर्थ है और शक्तिपीठ परंपरा में गिना जाता है; वहाँ देवी काली का काले पत्थर का स्वरूप है और दर्शन की पंक्तियाँ वर्ष भर लगी रहती हैं। दक्षिणेश्वर हुगली के पूर्वी तट पर उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में रानी रासमणि द्वारा बनवाया गया मंदिर है, जहाँ देवी भवतारिणी के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
दक्षिणेश्वर की प्रसिद्धि का बड़ा कारण रामकृष्ण परमहंस हैं, जो वहाँ लंबे समय तक पुजारी रहे। उनके जीवन-वृत्तांतों में काली उनके लिए दार्शनिक विचार नहीं, जीवित उपस्थिति थीं — वे उन्हें माँ कहकर पुकारते, उनसे बातें करते और भावावस्था में चले जाते थे। उन्होंने तंत्र, वेदांत और वैष्णव भक्ति सहित कई मार्गों का अभ्यास किया और अंततः यह कहा कि सब एक ही सत्य तक पहुँचते हैं। उनके शिष्य विवेकानंद के माध्यम से यह दृष्टि व्यापक रूप से फैली, और उसी के कारण उन्नीसवीं सदी के बाद काली की छवि उपनिवेशी लेखन की “भयानक देवी” से बदलकर करुणामयी माँ की हुई। रामकृष्ण से जुड़े प्रसंगों का विस्तृत विवरण Notable Masters पृष्ठ पर है।
तांत्रिक और भक्ति पद्धति में क्या अंतर है?
काली पूजा दो धाराओं में एक साथ चलती है, और यही इस पर्व की सबसे कम समझी जाने वाली बात है।
भक्ति पद्धति वही है जो अधिकांश पंडालों और घरों में दिखती है: प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा, षोडशोपचार पूजा, पुष्पांजलि, आरती, स्तोत्र-पाठ, श्यामा संगीत, और भोग का वितरण। इसमें कुछ भी गुप्त नहीं; कोई भी सम्मिलित हो सकता है।
तांत्रिक पद्धति दीक्षित साधकों की है। उसमें न्यास, बीज मंत्र का जप, यंत्र की पूजा और गुरु-परंपरा से प्राप्त क्रम केंद्रीय होते हैं, और यह प्रायः एकांत में, बिना किसी को बताए की जाती है। कुछ साधक इसी रात श्मशान-साधना का अभ्यास करते हैं, जो कौल परंपरा का पुराना अंग है। इस साइट पर ऐसी कोई विधि नहीं दी जाती — परंपरा स्वयं इसके लिए योग्य गुरु से दीक्षा को आवश्यक बताती है, और बिना मार्गदर्शन किए गए अभ्यास से किसी फल का वादा नहीं करती। तंत्र विद्या क्या है पृष्ठ पर इस अंतर की विस्तृत चर्चा है।
यह भी कहना जरूरी है कि काली पूजा के नाम पर प्रचारित “टोटके”, वशीकरण या किसी को हानि पहुँचाने वाले प्रयोग न परंपरा का हिस्सा हैं, न इस साइट का विषय। ऐसे दावों की पड़ताल Fear of Black Magic पृष्ठ पर की गई है।
घर में काली पूजा कैसे होती है? विधि, सामग्री और मंत्र
यह प्रचलित रीति का विवरण है, कोई शास्त्रीय निर्देश नहीं; परिवार, क्षेत्र और पुरोहित के अनुसार क्रम बदलता है। बंगाल में पूरी रात की विस्तृत पूजा प्रायः प्रशिक्षित पुरोहित कराते हैं, क्योंकि शाक्त पूजा का क्रम लंबा है और उसे इंटरनेट से पढ़कर दोहराना परंपरा का तरीका नहीं है। घर की सरल पूजा का ढाँचा प्रायः ऐसा रहता है:
- तैयारी: दिन में घर और पूजा-स्थान की सफाई, स्नान, और कई परिवारों में दिन भर उपवास या हल्का भोजन।
- स्थापना: संध्या के बाद चौकी पर लाल या काला वस्त्र बिछाकर देवी की प्रतिमा या चित्र, जल से भरा घट या कलश, और दीप।
- संकल्प और ध्यान: पूजा करने वाला अपना नाम, तिथि और उद्देश्य कहकर संकल्प लेता है, फिर देवी के स्वरूप का ध्यान।
- उपचार: जल, पुष्प, सिंदूर, धूप, दीप और नैवेद्य का क्रम से अर्पण — विस्तृत पूजा में यही षोडशोपचार कहलाता है।
- निशीथ में मुख्य अर्चना: गुड़हल के फूलों की पुष्पांजलि, नाम-जप या स्तोत्र-पाठ, और श्यामा संगीत।
- आरती और भोग: आरती के बाद भोग का वितरण; दीप प्रायः भोर तक जलता रहता है। मिट्टी की प्रतिमा हो तो अगले दिन या कुछ दिन बाद उसका विसर्जन होता है।
जो परिवार उसी रात लक्ष्मी पूजा भी करते हैं, वे प्रायः संध्या का समय लक्ष्मी को और मध्यरात्रि का समय काली को देते हैं।
काली पूजा की सामग्री
| सामग्री | परंपरा में उपयोग |
|---|---|
| प्रतिमा या चित्र, लाल या काला वस्त्र, चौकी | देवी का आसन |
| गुड़हल (जवा) के फूल और उनकी माला | काली का सबसे प्रिय माना जाने वाला फूल; बंगाल में इसे जवा कहते हैं |
| बिल्वपत्र, दूर्वा, अन्य लाल फूल | पुष्पांजलि |
| घट या कलश, आम के पत्ते, नारियल | घट-स्थापना |
| सिंदूर, रोली, अक्षत, चंदन | तिलक और अर्पण |
| सरसों के तेल या घी के दीप, धूप, कपूर | दीप और आरती |
| मिठाई, फल, खिचड़ी या अन्य पका भोग | नैवेद्य; बंगाल के घरों में खिचड़ी-भोग आम है |
| शंख, घंटी, पंचपात्र और आचमनी | पूजा के उपकरण |
काली पूजा का मंत्र
सबसे अधिक प्रकाशित और सार्वजनिक रूप से जपा जाने वाला काली मंत्र ॐ क्रीं कालिकायै नमः है — अर्थात “ॐ, क्रीं, कालिका को नमन”, जिसमें क्रीं काली का बीज-अक्षर है। देवी का नाम, काली गायत्री और कर्पूरादि स्तोत्र जैसे स्तोत्र भी बिना दीक्षा के पढ़े जाते हैं। लंबे मूल मंत्र और गिनती वाला जप परंपरा गुरु से दीक्षा लेकर ही करने को कहती है, इसलिए यहाँ जप-संख्या या किसी फल का दावा नहीं दिया गया है। हर शब्द का अर्थ और जप के नियम Kali Mantra पृष्ठ पर विस्तार से हैं।
बंगाल के बाहर काली पूजा
असम में यह पर्व मजबूती से मनाया जाता है, और कामाख्या मंदिर तथा गुवाहाटी के काली मंदिरों में इस रात विशेष आयोजन होते हैं। ओडिशा के कुछ भागों में, विशेष रूप से उत्तरी जिलों और शहरी पंडाल-परंपरा में, काली पूजा दीपावली के साथ-साथ होती है, जबकि राज्य के अन्य भागों में उसी रात लक्ष्मी और पूर्वजों से जुड़े आचरण प्रमुख रहते हैं। त्रिपुरा में त्रिपुरेश्वरी मंदिर इस रात का बड़ा केंद्र है, और बांग्लादेश के शाक्त क्षेत्रों में भी यह परंपरा चलती है।
बिहार में काली पूजा दीपावली की ही रात, 8 नवंबर 2026 को है। मिथिला और पूर्वी बिहार में शाक्त परंपरा पुरानी है, और वहाँ के शहरों-कस्बों में बंगाल की तरह पंडालों में काली की प्रतिमा बिठाई जाती है; पटना के लिए द्रिक पंचांग निशीथ काल रात 11:07 से 11:59 बजे तक बताता है। झारखंड के शहरों में भी पंडाल-परंपरा प्रचलित है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसके एक सप्ताह बाद छठ पूजा आती है — उसकी तिथि नीचे की तालिका में है।
एक और बात ध्यान देने योग्य है: काली पूजा केवल वर्ष में एक रात की बात नहीं। बंगाल और असम के काली मंदिरों में प्रतिदिन पूजा होती है, और अमावस्या तथा मंगलवार-शनिवार विशेष माने जाते हैं। तारापीठ जैसे केंद्रों में कौशिकी अमावस्या का अपना अलग महत्व है — उस पर अलग से Tarapith Temple Guide में लिखा गया है।
काली पूजा के बाद: जगद्धात्री पूजा और आसपास के पर्व
बंगाल के शाक्त कैलेंडर में काली पूजा के बाद अगला बड़ा पर्व जगद्धात्री पूजा है, कार्तिक शुक्ल नवमी को। जगद्धात्री, “जगत को धारण करने वाली”, दुर्गा का ही एक स्वरूप मानी जाती हैं — सिंह पर आसीन, चतुर्भुजा, और उनके नीचे हाथी के रूप में पराजित असुर। द्रिक पंचांग कोलकाता के लिए जगद्धात्री पूजा 2026 गुरुवार, 19 नवंबर को बताता है; नवमी तिथि 18 नवंबर सुबह 6:04 बजे से 19 नवंबर सुबह 7:05 बजे तक है, इसलिए कुछ कैलेंडर 18 नवंबर भी लिखते हैं। परंपरा इसका सार्वजनिक आरंभ नदिया के उन्हीं राजा कृष्णचंद्र से जोड़ती है जिनका नाम काली पूजा के प्रसार के साथ आता है, और आज हुगली जिले का चंदननगर तथा नदिया का कृष्णनगर इसके सबसे प्रसिद्ध केंद्र हैं।
| पर्व | 2026 की तिथि | संबंध |
|---|---|---|
| काली चौदस / भूत चतुर्दशी / नरक चतुर्दशी | शनिवार, 7 नवंबर | काली पूजा से एक दिन पहले की चतुर्दशी |
| काली पूजा / दीपावली | रविवार, 8 नवंबर | कार्तिक अमावस्या |
| छठ पूजा (संध्या अर्घ्य) | रविवार, 15 नवंबर | कार्तिक शुक्ल षष्ठी; बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश |
| जगद्धात्री पूजा | गुरुवार, 19 नवंबर (कोलकाता) | कार्तिक शुक्ल नवमी; बंगाल का शाक्त पर्व |
| काल भैरव जयंती | मंगलवार, 1 दिसंबर | मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी; देखें भैरव |
ये तिथियाँ द्रिक पंचांग की सूचियों से हैं (भैरव जयंती और छठ नई दिल्ली की गणना से)। चंद्र तिथि दो सौर दिनों में फैली हो तो पंचांगों में एक दिन का अंतर आ सकता है — अपने शहर के पंचांग से पुष्टि करें।
काली मंदिरों में पशुबलि
कुछ काली मंदिरों में आज भी पशुबलि की प्रथा है, मुख्यतः बकरे की; कालीघाट और तारापीठ इसके सबसे चर्चित उदाहरण हैं, और काली पूजा तथा दुर्गा पूजा की अष्टमी-नवमी पर इसकी संख्या बढ़ती है। यह प्रथा कालिका पुराण जैसे शाक्त ग्रंथों में वर्णित है और बंगाल-असम की शाक्त परंपरा का ऐतिहासिक अंग रही है।
साथ ही यह भारत में कानूनी और नैतिक विवाद का विषय है। अनेक मंदिरों और घरों ने इसके स्थान पर प्रतीकात्मक विकल्प अपना लिए हैं — कुम्हड़ा, गन्ना, केला या नारियल — और अनेक शाक्त परिवार पूरी तरह निरामिष पूजा करते हैं। यह विवरण यहाँ तथ्य के रूप में दिया गया है; न इसका समर्थन, न कोई विधि। जो लोग इससे बचना चाहते हैं वे मंदिर के उस क्षेत्र से दूर रह सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
काली पूजा 2026 कब है?
द्रिक पंचांग के अनुसार काली पूजा 2026 में रविवार, 8 नवंबर 2026 को है, कार्तिक मास की अमावस्या को। अमावस्या तिथि 8 नवंबर सुबह 11:27 बजे से 9 नवंबर दोपहर 12:31 बजे तक है, और मुख्य पूजा 8 नवंबर की रात निशीथ काल में होती है। निशीथ का समय शहर के अनुसार बदलता है।
काली पूजा 2026 में निशीथ काल का समय क्या है?
द्रिक पंचांग के अनुसार 8 नवंबर 2026 की रात निशीथ काल कोलकाता में 10:55 से 11:46 बजे, गुवाहाटी में 10:41 से 11:33 बजे, पटना में 11:07 से 11:59 बजे, दिल्ली में 11:39 से 12:31 बजे और पुणे में 11:53 से 12:44 बजे तक है। यह लगभग पचास मिनट का समय पूजा का केंद्र माना जाता है; पूजा स्वयं प्रायः भोर तक चलती है।
काली चौदस 2026 कब है?
द्रिक पंचांग के अनुसार काली चौदस शनिवार, 7 नवंबर 2026 को है, काली पूजा से एक दिन पहले। चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर सुबह 10:47 बजे से 8 नवंबर सुबह 11:27 बजे तक है। गुजरात में यह महाकाली की उपासना की रात है, उत्तर भारत में इसी दिन नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली और बंगाल में भूत चतुर्दशी होती है।
काली पूजा और दीपावली एक ही दिन क्यों होती हैं?
क्योंकि दोनों कार्तिक मास की अमावस्या को पड़ती हैं। यह वर्ष की सबसे अँधेरी रातों में से एक है, और भारत के अलग-अलग क्षेत्रों ने इसे अलग अर्थ दिया — उत्तर और पश्चिम भारत में लक्ष्मी पूजा तथा दीपों की रात, और बंगाल, असम व ओडिशा के कुछ भागों में देवी काली की रात।
काली पूजा और लक्ष्मी पूजा में क्या अंतर है?
देवी, समय और भाव तीनों अलग हैं। लक्ष्मी पूजा प्रदोष काल में यानी सूर्यास्त के बाद होती है और उसका भाव समृद्धि तथा शुभ आरंभ का है। काली पूजा निशीथ काल यानी मध्यरात्रि में होती है और उसका भाव निर्भयता तथा काल के सामने खड़े होने का है। बंगाल में लक्ष्मी पूजा का अपना अलग दिन कोजागरी पूर्णिमा है।
काली पूजा निशीथ काल में क्यों की जाती है?
निशीथ काल रात का मध्य भाग है, लगभग आधी रात के आसपास। शाक्त और तांत्रिक परंपराएँ इसे उग्र देवी-उपासना के लिए सबसे उपयुक्त मानती हैं, क्योंकि काली का संबंध काल, रात्रि और विलय से है। अमावस्या की सबसे गहरी घड़ी में उनकी पूजा करना परंपरा की दृष्टि से संगत माना जाता है।
बंगाल में काली पूजा कैसे शुरू हुई?
काली का उल्लेख बहुत पुराना है, पर प्रतिमा और सार्वजनिक पंडाल वाली आज की परंपरा बाद में बनी। बंगाली परंपरा तंत्रसार के रचयिता कृष्णानंद आगमवागीश को दक्षिणाकाली के प्रचलित स्वरूप से जोड़ती है, और नदिया के राजा कृष्णचंद्र के संरक्षण को इसके व्यापक प्रसार का कारण बताती है। ये पारंपरिक श्रेय हैं, जिनमें किंवदंती और इतिहास दोनों मिले हैं।
कालीघाट और दक्षिणेश्वर में क्या अंतर है?
कालीघाट दक्षिण कोलकाता का प्राचीन तीर्थ है, जिसे शक्तिपीठ परंपरा में गिना जाता है और जहाँ देवी काले पत्थर के स्वरूप में हैं। दक्षिणेश्वर हुगली के तट पर उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में रानी रासमणि द्वारा बनवाया गया मंदिर है, जहाँ देवी भवतारिणी के रूप में हैं और जो रामकृष्ण परमहंस के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
बिहार में काली पूजा कब है?
बिहार में भी काली पूजा दीपावली की ही रात होती है, यानी 2026 में रविवार, 8 नवंबर को। पटना के लिए द्रिक पंचांग निशीथ काल रात 11:07 से 11:59 बजे तक बताता है। मिथिला और पूर्वी बिहार में पंडालों में काली प्रतिमा बिठाने की परंपरा प्रचलित है, और एक सप्ताह बाद, 15 नवंबर को, छठ पूजा आती है।
घर में काली पूजा कैसे करें?
प्रचलित रीति में संध्या के बाद पूजा-स्थान पर देवी का चित्र या प्रतिमा, घट और दीप रखे जाते हैं; संकल्प और ध्यान के बाद पुष्प, सिंदूर, धूप, दीप और भोग अर्पित किए जाते हैं, और निशीथ काल में गुड़हल की पुष्पांजलि, नाम-जप या स्तोत्र-पाठ होता है। विस्तृत रात भर की पूजा बंगाल में प्रायः पुरोहित कराते हैं। यह विवरण है, कोई तांत्रिक विधि नहीं।
क्या काली पूजा में पशुबलि आवश्यक है?
नहीं। कुछ मंदिरों में यह प्रथा आज भी है और शाक्त ग्रंथों में उसका वर्णन मिलता है, पर यह भारत में कानूनी और नैतिक विवाद का विषय है। अनेक मंदिरों और घरों ने इसके स्थान पर कुम्हड़ा, गन्ना, केला या नारियल जैसे प्रतीकात्मक विकल्प अपना लिए हैं, और बहुत से शाक्त परिवार पूरी तरह निरामिष पूजा करते हैं।
स्रोत एवं अधिक पढ़ने के लिए
- 2026 की तिथि और निशीथ काल: Drik Panchang, Bengal Kali Puja 2026 (कोलकाता, गुवाहाटी, पटना, नई दिल्ली, पुणे की गणना); अपने शहर के पंचांग से पुष्टि करें।
- काली चौदस, छठ, जगद्धात्री पूजा और काल भैरव जयंती 2026: Drik Panchang की काली चौदस, छठ पूजा, जगद्धात्री पूजा और कालभैरव जयंती सूचियाँ।
- Rachel Fell McDermott, Revelry, Rivalry, and Longing for the Goddesses of Bengal, Columbia University Press, 2011.
- Rachel Fell McDermott & Jeffrey J. Kripal (eds.), Encountering Kālī: In the Margins, at the Center, in the West, University of California Press, 2003.
- June McDaniel, Offering Flowers, Feeding Skulls: Popular Goddess Worship in West Bengal, Oxford University Press, 2004.
- David Kinsley, Tantric Visions of the Divine Feminine: The Ten Mahāvidyās, University of California Press, 1997.
- Swami Nikhilananda (trans.), The Gospel of Sri Ramakrishna, Ramakrishna-Vivekananda Center, 1942.
- प्राथमिक स्रोत: देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) और कालिका पुराण; अनुवादों के लिए पठन-सूची देखें।