महाविद्या 3 / 10

त्रिपुर सुंदरी: ललिता, षोडशी, श्रीविद्या और श्री यंत्र

त्रिपुरसुन्दरी

Loading...अंतिम अद्यतन: 28 सितंबर 2026

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त्रिपुर सुंदरी — “तीनों लोकों की सुंदरी” — दस महाविद्याओं में तीसरी और श्रीविद्या परंपरा की परम देवी हैं। उन्हें ललिता (“जो लीला करती हैं”), षोडशी (“सोलह वर्ष की”) और राजराजेश्वरी भी कहा जाता है, और उनकी उपासना सबसे अधिक श्री यंत्र के माध्यम से होती है।

काली और तारा उग्र चित्रों से सिखाती हैं; त्रिपुर सुंदरी सौंदर्य, आनंद और राजसी ऐश्वर्य से। उनके उपासकों के लिए जगत छोड़ने की वस्तु नहीं, चेतना की आनंदमयी लीला है। इस पृष्ठ पर उनके नामों का अर्थ, प्रतीक, प्रमुख कथा, श्रीविद्या का परिचय, मंत्र-परंपरा और मंदिर दिए गए हैं।

देवी त्रिपुर सुंदरी — तीसरी महाविद्या, पाश, अंकुश, इक्षु-धनुष और पुष्प-बाण सहित
त्रिपुर सुंदरी (ललिता) पाश, अंकुश, इक्षु-धनुष और पाँच पुष्प-बाण धारण करती हैं।

त्रिपुर सुंदरी नाम का अर्थ क्या है?

सुंदरी का अर्थ स्पष्ट है। त्रिपुर का शाब्दिक अर्थ है “तीन नगर”, पर श्रीविद्या में इसे कई तरह से पढ़ा जाता है, जैसा डगलस ब्रूक्स ने Auspicious Wisdom में दिखाया है — तीन लोक (भूः, भुवः, स्वः), जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति की तीन अवस्थाएँ, इच्छा-ज्ञान-क्रिया की तीन शक्तियाँ, या ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय की त्रिपुटी। देवी वह सौंदर्य हैं जो इन सब त्रिपुटियों के मूल में है और उनसे परे भी।

ललिता, षोडशी और उनके अन्य नाम

  • ललिता — “जो लीला करती हैं”: सृष्टि उनका सहज खेल है।
  • षोडशी — “जो सोलह की हैं”: नित्य-तरुण सौंदर्य; यह नाम सोलह अक्षरों वाले मंत्र और चंद्रमा की सोलह कलाओं से भी जुड़ता है।
  • राजराजेश्वरी — “राजाओं की भी रानी”: ब्रह्मांड की सार्वभौम अधीश्वरी।
  • कामेश्वरी — शिव के कामेश्वर रूप की शक्ति।
  • बाला त्रिपुरसुंदरी — उनका बालिका रूप, जिससे प्रायः श्रीविद्या की शुरुआत कराई जाती है।

त्रिपुर सुंदरी का स्वरूप और प्रतीक

श्रीविद्या के ध्यान-श्लोक उन्हें उगते सूर्य जैसी अरुण वर्ण की बताते हैं — तीन नेत्र, मुकुट में चंद्र-कला, और ऐसे सिंहासन पर विराजमान जिसके पाये ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर हैं तथा आसन सदाशिव। उनके हाथ की हर वस्तु एक शिक्षा है।

लक्षणपारंपरिक अर्थ
अरुण या रक्त वर्णकरुणा, अनुराग और चेतना का प्रभात
पाशआसक्ति या इच्छा, जिससे वे बाँधती भी हैं और जिस पर उनका अधिकार भी है
अंकुशसंयम और दिशा देने की शक्ति, जिसमें द्वेष पर नियंत्रण भी है
इक्षु-धनुष (गन्ने का धनुष)मन, जिसकी मिठास अनुभव को अपनी ओर खींचती है
पाँच पुष्प-बाणपाँच इंद्रियाँ और उनके विषय
पाँच देवताओं का सिंहासनउनकी सर्वोच्चता — सृष्टि, पालन, संहार, तिरोधान और अनुग्रह सब उनकी सेवा में
चंद्र-कलाअमृत, काल और चेतना की कलाएँ
नित्य-तरुण सौंदर्यवह चेतना जो कभी वृद्ध नहीं होती

चित्र का मर्म यह है कि देवी इच्छा, मन और इंद्रियों को अस्वीकार नहीं करतीं — वे उन्हें अपने उपकरण की तरह धारण करती हैं। श्रीविद्या परिष्कृत इच्छा (इच्छा शक्ति) को दमन की वस्तु नहीं, दिव्य संकल्प का रूप मानती है।

ललिता और भंडासुर की कथा

ललिता की प्रमुख कथा ब्रह्मांड पुराण के ललितोपाख्यान खंड में है। शिव ने जब कामदेव को भस्म किया, तो उसी भस्म से भंडासुर नामक दैत्य उत्पन्न हुआ और तीनों लोकों को पीड़ित करने लगा। देवताओं ने महायज्ञ किया और अंत में स्वयं को भी अग्नि में आहुत कर दिया। उसी चिदग्नि से देवी ललिता तेजस्वी और सर्वास्त्र-सज्जित प्रकट हुईं।

वे अपनी शक्तियों — श्यामला (मंत्रिणी) और वाराही (दंडनाथा) आदि — के साथ निकलीं और भंडासुर तथा उसकी सेनाओं का संहार किया। इसके बाद उन्होंने कामेश्वर से विवाह किया और कामदेव को पुनर्जीवन दिया। कथा का प्रतीक-पाठ यह है कि भंडासुर वह अहंकार है जो इच्छा के चेतना से कट जाने पर जन्मता है, और ललिता की विजय इच्छा को उसके दिव्य स्रोत पर लौटा देती है।

सती के दस रूपों में षोडशी

महाभागवत पुराण की महाविद्या-कथा में सुंदरी या षोडशी उन दस रूपों में से एक हैं जो सती दक्ष के यज्ञ में जाने से पहले शिव को अपनी पूर्ण शक्ति दिखाने के लिए धारण करती हैं। दसों की सूची ग्रंथ-ग्रंथ में बदलती है; कुछ षोडशी और त्रिपुर सुंदरी को एक ही मानते हैं, कुछ संबंधित रूपों को अलग गिनते हैं।

श्रीविद्या: त्रिपुर सुंदरी की परंपरा

श्रीविद्या (“शुभ विद्या”) वह शाक्त तांत्रिक परंपरा है जिसके केंद्र में त्रिपुर सुंदरी हैं। यह श्रीकुल की धारा है, जो काली-केंद्रित कालीकुल से भिन्न है। इसके मूल विचार कश्मीर के अद्वैत शैव दर्शन से बहुत मिलते हैं — चेतना ही एकमात्र सत्ता है, और देवी वही चेतना अपने गतिशील, आत्म-सजग, आनंदमय पक्ष में।

प्रमुख ग्रंथों में वामकेश्वर तंत्र (नित्याषोडशिकार्णव और योगिनी हृदय सहित), तंत्रराज तंत्र और ब्रह्मांड पुराण में आया ललिता सहस्रनाम हैं। आदि शंकराचार्य से जोड़ी जाने वाली सौंदर्यलहरी भी केंद्रीय है, और अठारहवीं शताब्दी के भास्करराय की टीकाएँ आज भी प्रामाणिक मानी जाती हैं। दक्षिण भारत में श्रीविद्या शंकराचार्य मठों और स्मार्त ब्राह्मण परिवारों से जुड़ी रही, जिससे इसका स्वरूप अन्य तांत्रिक परंपराओं की तुलना में अधिक “दक्षिणाचारी” रहा। विस्तृत परिचय Sri Vidya पृष्ठ पर है।

पंचदशी मंत्र और श्री यंत्र

त्रिपुर सुंदरी का मूल मंत्र पंचदशी है, अर्थात् पंद्रह अक्षरों का। यह तीन खंडों (कूट) में बँटा है और हर खंड ह्रीं पर समाप्त होता है; तीनों को वाणी, इच्छा और शक्ति से जोड़ा जाता है। इसके दो प्रमुख पाठ हैं — कादि और हादि। श्रीं जोड़ देने पर सोलह अक्षरों का षोडशी मंत्र बनता है। मंत्र छपी पुस्तकों में मिल जाता है, फिर भी श्रीविद्या सबसे कठोरता से दीक्षा-आधारित परंपराओं में है; साधक प्रायः बाला मंत्र से आरंभ कर क्रमशः आगे बढ़ते हैं।

श्री यंत्र

देवी की उपासना सबसे अधिक श्री यंत्र (श्रीचक्र) के माध्यम से होती है, जिसे श्रीविद्या उनका सूक्ष्म शरीर मानती है। यह नौ परस्पर-भेदी त्रिकोणों से बना है — चार ऊर्ध्वमुख (शिव) और पाँच अधोमुख (शक्ति) — जिनके केंद्र में बिंदु है। इनके चारों ओर आठ और सोलह दल के कमल, वृत्त और चार द्वारों वाला भूपुर रहते हैं। पूरा यंत्र नौ आवरणों में बँटा है, और नवावरण पूजा में साधक बाहरी भूपुर से भीतर बिंदु तक क्रमशः उपासना करता है। ज्यामिति का विस्तृत विवरण Sri Yantra पृष्ठ पर है।

त्रिपुर सुंदरी और ललिता में क्या अंतर है?

कोई अंतर नहीं — श्रीविद्या में ललिता, त्रिपुर सुंदरी, षोडशी और राजराजेश्वरी एक ही देवी के नाम हैं। अलग-अलग संदर्भों में अलग नाम प्रमुख हो जाता है: पौराणिक कथा और सहस्रनाम में “ललिता”, तांत्रिक ग्रंथों में “त्रिपुर सुंदरी”, और महाविद्या सूचियों में प्रायः “षोडशी”। नीचे की तालिका उन देवियों से संबंध बताती है जिनसे प्रायः भ्रम होता है।

तुलनासंबंध
ललिता / षोडशी / राजराजेश्वरीएक ही देवी के भिन्न नाम
बाला त्रिपुरसुंदरीउनका बालिका रूप, जिसका अपना मंत्र है
भुवनेश्वरीअलग महाविद्या, पर स्वरूप बहुत मिलता-जुलता (अरुण वर्ण, पाश-अंकुश)
कालीशाक्त तंत्र का दूसरा ध्रुव — कालीकुल बनाम श्रीकुल, उग्र बनाम सौम्य
कामाक्षीकांचीपुरम की अधिष्ठात्री देवी, जिन्हें श्रीविद्या में ललिता से एकरूप माना जाता है

त्रिपुर सुंदरी के मंदिर

  • कामाक्षी अम्मन मंदिर, कांचीपुरम (तमिलनाडु) — श्रीविद्या का प्रमुख केंद्र, जहाँ परंपरा के अनुसार आदि शंकराचार्य ने श्रीचक्र स्थापित किया।
  • त्रिपुर सुंदरी मंदिर, उदयपुर (त्रिपुरा) — स्थानीय रूप से माताबाड़ी कहलाता है और शक्तिपीठों में गिना जाता है; राज्य का नाम भी इसी से जोड़ा जाता है।
  • कामाख्या मंदिर परिसर, गुवाहाटी — नीलाचल पहाड़ी पर महाविद्या मंदिरों में त्रिपुर सुंदरी का स्थान भी है।

इनके अतिरिक्त दक्षिण भारत के अनेक देवी मंदिरों में श्रीचक्र की प्रतिष्ठा है। शक्तिपीठों की सूची शक्तिपीठ पृष्ठ पर देखी जा सकती है।

पर्व और तिथि

त्रिपुर सुंदरी का विशेष स्मरण नवरात्रि में होता है। अनेक श्रीविद्या परिवार ललिता पंचमी — आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी — का पालन करते हैं, और शुक्रवार तथा पूर्णिमा को ललिता सहस्रनाम का पाठ करते हैं। ग्रेगोरियन तिथि हर वर्ष बदलती है, इसलिए पंचांग देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

त्रिपुर सुंदरी कौन हैं?

त्रिपुर सुंदरी दस महाविद्याओं में तीसरी और श्रीविद्या परंपरा की परम देवी हैं। उनके नाम का अर्थ है तीनों लोकों की सुंदरी। उन्हें ललिता, षोडशी और राजराजेश्वरी भी कहा जाता है। वे अरुण वर्ण की हैं, पाश, अंकुश, इक्षु-धनुष और पुष्प-बाण धारण करती हैं, और श्री यंत्र में पूजी जाती हैं।

त्रिपुर सुंदरी और ललिता में क्या अंतर है?

कोई अंतर नहीं। श्रीविद्या में ललिता, त्रिपुर सुंदरी, षोडशी और राजराजेश्वरी एक ही देवी के नाम हैं। ललितोपाख्यान और ललिता सहस्रनाम में ललिता नाम प्रमुख है, तांत्रिक ग्रंथों में त्रिपुर सुंदरी, और महाविद्या सूचियों में प्रायः षोडशी।

उन्हें षोडशी क्यों कहा जाता है?

षोडशी का अर्थ है सोलह वर्ष की। यह नाम उनके नित्य-तरुण सौंदर्य को बताता है। साथ ही यह सोलह अक्षरों वाले षोडशी मंत्र से और चंद्रमा की सोलह कलाओं से भी जुड़ता है, जिन्हें तांत्रिक चिंतन में पूर्णता का प्रतीक माना जाता है।

श्रीविद्या क्या है?

श्रीविद्या त्रिपुर सुंदरी पर केंद्रित शाक्त तांत्रिक परंपरा है। यह अपने अद्वैत दर्शन, पंचदशी मंत्र और श्री यंत्र की उपासना के लिए जानी जाती है। इसके प्रमुख ग्रंथ वामकेश्वर तंत्र, ललिता सहस्रनाम और सौंदर्यलहरी हैं। परंपरा में इसका अभ्यास गुरु से दीक्षा लेकर ही किया जाता है।

त्रिपुर सुंदरी का मंत्र क्या है?

उनका मूल मंत्र पंद्रह अक्षरों का पंचदशी है, जिसके तीन खंड हैं और हर खंड ह्रीं पर समाप्त होता है; श्रीं जोड़ने पर सोलह अक्षरों का षोडशी मंत्र बनता है। श्रीविद्या परंपरा इसे केवल दीक्षा में देती है, प्रायः बाला मंत्र के बाद। सामान्य भक्त ललिता सहस्रनाम का पाठ करते हैं।

श्री यंत्र और त्रिपुर सुंदरी का क्या संबंध है?

श्री यंत्र या श्रीचक्र त्रिपुर सुंदरी का ज्यामितीय स्वरूप माना जाता है। उसके नौ परस्पर-भेदी त्रिकोण, कमल और भूपुर मिलकर नौ आवरण बनाते हैं, जिनमें उनकी सहचरी शक्तियाँ रहती हैं। नवावरण पूजा में साधक बाहर से भीतर बढ़ते हुए केंद्र के बिंदु तक पहुँचता है।

त्रिपुर सुंदरी का मंदिर कहाँ है?

प्रमुख केंद्रों में त्रिपुरा के उदयपुर का त्रिपुर सुंदरी (माताबाड़ी) मंदिर है, जो शक्तिपीठों में गिना जाता है, और कांचीपुरम का कामाक्षी अम्मन मंदिर, जो श्रीविद्या का बड़ा केंद्र है। असम के कामाख्या परिसर में भी दस महाविद्याओं के साथ उनका स्थान है।

स्रोत एवं अधिक पढ़ने के लिए

  • Douglas Renfrew Brooks, Auspicious Wisdom: The Texts and Traditions of Śrīvidyā Śākta Tantrism in South India, SUNY Press, 1992.
  • Douglas Renfrew Brooks, The Secret of the Three Cities: An Introduction to Hindu Śākta Tantrism, University of Chicago Press, 1990.
  • David Kinsley, Tantric Visions of the Divine Feminine: The Ten Mahāvidyās, University of California Press, 1997.
  • Madhu Khanna, Yantra: The Tantric Symbol of Cosmic Unity, Thames & Hudson, 1979.
  • W. Norman Brown (अनुवाद), The Saundaryalaharī, or Flood of Beauty, Harvard University Press, 1958.
  • S. Shankaranarayanan, The Ten Great Cosmic Powers, 1972.